हिमालय की गोद में, अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ मार्ग पर स्थित मिरतोला आश्रम (उत्तर वृन्दावन) केवल एक आध्यात्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि पर्वतीय विकास की एक अनूठी प्रयोगशाला भी है। समुद्र तल से 2160 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह आश्रम पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक विकास-तीर्थ के रूप में उभर कर आया है।

मिरतोला अल्मोड़ा से लगभग 23 किमी की दूरी पर स्थित एक गाँव है । यह अल्मोड़ा – पिथौरागढ़ मार्ग पर स्थित अपने आश्रम के लिए प्रसिद्ध है जिसे उत्तर वृंदावन भी कहा जाता है । इस आश्रम की स्थापना 1930 में श्री यशोदा माँ और उनके शिष्य कृष्ण प्रेम द्वारा की गई थी ।
श्री यशोदा माँ मूल नाम मोनिका देवी था और ये लखनऊ विश्वविद्यालय के पहले कुलपति ज्ञानेंद्र नाथ चक्रवर्ती की पत्नी थीं । उन्होंने 1928 में संन्यास लिया । यह स्थान आश्रम की संस्थापक और आध्यात्मिक प्रमुख यशोदा माँ द्वारा 1931 में निर्मित राधा-कृष्ण मंदिर, उत्तर बृंदावन के लिए भी जाना जाता है ।
इस आश्रम का मूल उद्देश्य मानव जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पक्षों के बीच एक संतुलित समन्वय स्थापित करना था। यशोदा माँ के बाद श्री कृष्ण प्रेम और माधव आशीष जैसे मनीषियों ने इस कर्मभूमि को सींचा। माधव आशीष जी को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 1992 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया।

श्री कृष्ण प्रेम का मूल नाम रोनाल्ड हेनरी निक्सन था, जो प्रथम विश्व युद्ध में एक ब्रिटिश फाइटर पायलट थे । वे बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय में व्याख्याता बने और मोनिका देवी के शिष्य बन गए । हिंदू धर्म के वैष्णव पंथ में शामिल होने वाले पहले पश्चिमी व्यक्ति थे ।
श्री कृष्ण प्रेम के बाद आश्रम का कार्यभार उनके शिष्य श्री माधव आशीष (मूल नाम अलेक्जेंडर फिलिप्स ) ने संभाला, जो एक विमान इंजीनियर थे । श्री माधव आशीष (1920-1997) एक ब्रिटिश नागरिक थे और बाद में भारत में बस गए थे ।
आश्रम के प्रसिद्ध शिष्यों में डॉ. करण सिंह , यात्रा लेखक बिल एटकेन और सीमोर बी. गिन्सबर्ग शामिल हैं । आश्रम ने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर स्थानीय कृषि तथा पशु पालन की उन्नत तकनीकों और कार्यों को बढ़ावा दिया है ।
पहाड़ों में खेती अक्सर किस्मत का खेल मानी जाती है, जहाँ किसान बीज बोकर भाग्य के भरोसे बैठ जाता है। मिरतोला आश्रम ने इस दुष्चक्र को तोड़ा है। वैज्ञानिक बीजों और खाद के सटीक चुनाव से यहाँ ऐसी पैदावार ली जा रही है, जो मैदानी क्षेत्रों की फसलों को टक्कर देती है। आश्रम का मानना है कि पर्वतीय गाँव केवल नमक, गुड़ और तेल जैसी वस्तुओं के लिए बाजार पर निर्भर रहें, बाकी जरूरतें गाँव के भीतर ही पूरी होनी चाहिए। पहाड़ी ढालों पर सिंचाई एक बड़ी चुनौती है। आश्रम ने इसका समाधान पॉलीथीन अस्तर वाले टैंकों के रूप में खोजा तथा वर्षों पहले बारिश के पानी को संग्रहीत करने एवं पीने योग्य बनाने की स्थानीय तकनीकी को भी पोषित किया था।
मिरतोला आश्रम का मॉडल यह सिद्ध करता है कि यदि सही तकनीक और दृढ़ इच्छा शक्ति हो, तो हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों को भी आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।


