
अल्मोड़ा नगर से सात किमी की दूरी पर अल्मोड़ा- कफड़खान मार्ग पर पुरातन शक्तिपीठ कसारदेवी एक उंची चोटी पर स्थित है। स्कंद पुराण के मानस खंड में अल्मोड़ा के पास जिस काषाय पर्वत का उल्लेख है वह सम्भवतः कसारदेवी पर्वत ही है। शुम्भ निशुम्भ नामक दैत्यों का वध करने वाली देवी ने कौशकी रूप धारण कर काषाय पवर्त पर अवतरण किया था। एक प्राकृतिक चट्टान को देवी विग्रह मान कर पूजा की जाती है।स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1890 में अपने अल्मोड़ा प्रवास के समय इस स्थान पर ध्यान और साधना की थी, ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं। बिड़ला परिवार के लक्ष्मी नारायण बिड़ला द्वारा इस स्थान का पूर्व में जीर्णो़द्धार करवाया गया था।
मंदिर परिसर में दो अलग-अलग मंदिर हैं, एक देवी का और दूसरा भगवान शिव और भैरव का। मुख्य मंदिर में एक हवन कुंड भी है।

यह गाँव मुख्य रूप से कसार देवी मंदिर के लिए जाना जाता है, जो कसार देवी को समर्पित है। मुख्य सड़क से शुरुआत में ही मेन रोड पर एक घुमावदार रास्ता मंदिर तक जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा के अवसार पर कसार देवी मंदिर में एक बड़ा मेला लगता है।,

कसार देवी मंदिर के नजदीक ही छटी शती पूर्व का एक शिलालेख भी विद्यमान है जिसमें लिखा गया है कि वेतला पुत्र रूद्रक ने महादेव को स्थापित किया। इस लेख से इस धारणा की पुष्टि भी होती है कि लगभग 14 सौ वर्ष पूर्व यहां मंदिर स्थापित करने की परम्परा निश्चित रूप से प्रारम्भ हो चुकी थी।
परिसर में मौजूद पुराने मंदिर की चक्रिका की स्थिति से लगता है कि कभी यहां कोई प्राचीन बड़ा मंदिर रहा होगा। मंदिर के नीचे की एक चट्टान में प्राचीन शैलचित्र बने हुए हैं तथा कई चट्टानों पर कप माक्र्स भी मौजूद हैं। मंदिर के समीप ही 6टी शती का एक प्राचीन लेख भी उत्कीर्ण है।

इस मंदिर से एक ओर हवालबाग की विहंगम घाटी और दूसरी ओर हिमाच्छादित हिमालय की विस्तृत पर्वत श्रंखलाओं को निहारा जा सकता है।

कुछ साल पहले पूरे मंदिर परिसर का जीर्णाेद्धार करवाया गया है।



