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अल्मोड़ा की नंदादेवी और उनकी विरासत

उत्तराखंड की देवभूमि में नंदादेवी केवल एक देवी नहीं, बल्कि समूचे उत्तराखंड की सामूहिक एकरूपता की भी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीक हैं। अल्मोड़ा स्थित नंदादेवी मंदिर आज जिस श्रद्धा और सम्मान का केंद्र है, उसका इतिहास सदियों पुराना है और कई सांस्कृतिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है।

नंदादेवी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हरीश भंडारी

नंदादेवी की पूजा की परंपरा चंद राजाओं से भी पूर्व, कत्यूरी शासनकाल में भी प्रचलित थी। नवीं-दसवीं शताब्दी के अभिलेखीय प्रमाणों में “नन्दा भगवती” की स्तुति देखने को मिलती है। नंदादेवी कत्यूरी नरेशों की सम्भवतः ईष्टदेवी थीं। कत्यूरी नरेश ललितशूरदेव के ईस्वी सन 853 के ताम्रपत्र में वंश संस्थापक निंबर को नंदादेवी के चरण की शोभा से धन्य होना बताया गया है। कत्यूरी नरेश सलोणादित्य के ताम्रपत्र में भी नंदादेवी चरण कमल लक्ष्मीतीतःकहा गया है। यह प्रमाण इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कत्यूरी शासक नंदा भगवती को अपनी आराध्य देवी मानते थे।

जागेश्वर से प्राप्त एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि आठवीं सदी में नंदा भगवती के लिए धार्मिक प्राणोत्सर्ग करने वाले इस ओर आया करते थे। प्रमाण है कि तीर्थयात्री दूर-दूर से उत्तराखंड आकर नंदादेवी की उपासना किया करते थे। पुरातत्वविद डा0 चन्द्र सिंह चौहान का कथन है कि राजा उद्योतचंद के कार्यकाल में दिये गये दानपत्रों में नवदुर्गाओं का वर्णन उपलब्ध है। उन्होंने इन्हें नंदादेवी, पातालदेवी, स्याहीदेवी, बानड़ी देवी, जाखनदेवी, कसारदेवी, त्रिपुरा सुन्दरी, उल्का देवी एवं नाइल देवी कहा है । नंदादेवी की उपासना केवल शासक वर्ग तक सीमित नहीं थी, वे जन-जन की आराध्य देवी थीं।

कौशल सक्सेना (2010)

चंद राजवंश और नंदादेवी की प्रतिष्ठा

हालांकि आज नंदादेवी को चंद राजाओं की इष्टदेवी माना जाता है, लेकिन वास्तव में यह परंपरा राजा बाज बहादुर चंद (1638–1678 ई.) के समय से प्रारंभ हुई। गढ़वाल पर बार-बार असफल आक्रमणों के बाद, बाज बहादुर चंद ने एक तांत्रिक सलाह के अनुसार प्रतिज्ञा की कि यदि वह युद्ध में विजय प्राप्त करते हैं, तो नंदादेवी की पूजा को अपने राज्य की राजकीय पूजा का दर्जा देंगे। विजय प्राप्त होने के बाद राजाअपनी प्रतिज्ञा पूरी की और तभी से नंदादेवी की पूजा सार्वजनिक उत्सव का रूप लेने लगी।

रवि गोयल(2025)

वर्तमान में अल्मोड़ा में स्थित जो मंदिर ‘नंदादेवी मंदिर’ कहलाता है, वह वास्तव में राजा उद्योत चंद (1678–1698 ई.) द्वारा बनवाया गया उदयोतचंदेश्वर मंदिर है। राजा दीपचंद के समय में भी पुराने मंदिर से जुड़ा एक विशाल मंडप बनाया गया । यह निर्माण दीपचंदेश्वर मंदिर कहलाया । गोरखा काल में भी यह मंदिर दीपचंदेश्वर मंदिर परिसर ही कहलाता था।अंग्रेज कमिश्नर ट्रेल् द्वारा वर्ष 1816 में नंदादेवी की प्रतिमा को मल्ला महल से दीपचंदेश्वर मंदिर में स्थानांन्तरित किये जाने के बाद यह स्थान नंदादेवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

कपिल मल्होत्रा

नंदादेवी के विविध रूप

नंदादेवी की पूजा के स्वरूप भी विविध रहे हैं। कई मंदिरों में देवी को सिंहवाहिनी (दुर्गा) के रूप में दर्शाया गया है, जबकि कुछ में महिषासुरमर्दिनी के रूप में। यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि नंदादेवी को दुर्गा के विभिन्न रूपों में पूजने की परंपरा रही है।अनेक साहित्यिक सन्दर्भों में उन्हे हिमालय की पुत्री पार्वती माना गया है। स्व0 शिरीष पांडे ने अपने एक लेख में उल्लेख किया है कि इतिहासविद् एम0पी0 जोशी एवम् गिरजा कल्याणम् पन्त ने चन्द वंशीय राजाओं की इष्देवी ‘नील सरस्वती’ एवम् ‘श्री अनिरूद्ध सरस्वती’ बताया है। उत्तराखण्ड में नन्दा भगवती दुर्गा के रूप में उनके दो स्वरूपों महिषासुरमर्दिनी और सिंहवाहिनी’ के रूप में पूजी जाती रही है।लेकिन मेले के अवसर पर जब पूजा की जाती है तब नन्दा भगवती का आह्नान ‘महिषासुर मर्दिनी’ के रूप में किया जाता है।

काशीपुर राजदरबार की ओर से स्व0 बृजराज साह को अपने पिता श्री के साथ इस मेले की सम्पूर्ण व्यवस्थाओं को सम्पन्न करने का सौभाग्य सन् 1957 से सन् 1979 तक प्राप्त रहा।
स्व0 बृजराज साह के अनुसार यह भ्रान्ति है कि महाअष्टमी की रात्री में नन्दा/गौरा का कन्यादान किया जाता है। यह बातें सही नहीं हैं और पूर्णतयां कपोल कल्पित हैं। जहां तक मेले के अवसर पर बनाई जाने वाली युगल प्रतिमाओं का प्रश्न है तो मां भगवती की जो दो मूर्तियां बनाई जाती हैं उनमें एक चन्द वंश की कुलदेवी ‘‘गौरा’’ तथा दूसरी कुमाऊॅं की रणचंड़ी ‘‘नन्दादेवी’’ की होती है। हिन्दू धार्मिक परम्पराओ के अनुसार कुल देवी का आवाहन एवम् पूजन किये बिना युद्ध क्षेत्र से वरण की गई रणचंडी की अर्चना पूजा नहीं की जा सकती है। महाअष्टमी का काल रात्री पूजन शाक्त परम्परा अनुसार होम, बलिदान कन्याकुमारी पूजन युक्त शोडषोपचार वैदिक पूजा पद्धति से किया जाता है। मूर्तियों के निर्माण में भी वेद विहित शुद्ध सामग्रियों यथाः कदली खम्ब, वस्त्र ‘‘तितपाती’’ (भृङगराज) इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। ये वस्तुऐं प्राकृतिक होने से साथ-साथ विसर्जनोंपरांत शीघ्र जल में विलीन होने वाली होती हैं।

इस लेख के लेखक का भी मानना है कि मेले में नन्दा प्रतिमाओं का पूजन  एवम् निर्माण पद्धति पूर्ण रूप से तान्त्रिक है। भगवती की पूजा तारा शक्ति के रूप में शोडषोपचार, पूजन, यज्ञ एवम् पशुबलि देकर की जाती है।

मूर्तियों का इतिहास

वर्तमान में अल्मोड़ा स्थित नंदादेवी मंदिर में तीन मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं, लेकिन उनके स्थापना काल और इतिहास के बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। बद्रीदत्त पांडे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कुमाऊँ का इतिहास’ में उल्लेख किया है कि चंद राजाओं द्वारा कई बार गढ़वाल से अनेक प्रतिमाऐं लाई गयी थीं। चंद राजाओं ने अपने राजनिवास मल्ला महल में स्थापित इन देवालयों में तीन बार स्वर्ण निर्मित नंदा प्रतिमाओं को अर्पित किया । सन्1699 में गढ़वाल से लाई गई एक मूर्ति का उल्लेख मिलता है, जबकि सन् 1766 में राजा जगत चंद ने मूर्ति न मिलने पर नई मूर्ति बनवाई थी।

स्व0 शिरीष पांडे ने यह उल्लेख किया है कि 1938 में राजा आनंद सिंह की मृत्यु के बाद एक मूर्ति खो गई, और 1972 में दूसरी मूर्ति चोरी हो गई। सन् 1938 तथा 1972 में जो दो मूर्तियां खो गई जिनके एवज में नई मूर्तियां रखी गई हैं, के विषय में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह वही मूर्तियाँ थीं जिनका वर्णन बद्रीदत्त पांडे ने किया है। कुछ विद्वानों का मानना है कि पहले जो स्वर्ण मूर्तियां थीं उन्हे रोहिले लूट कर ले गये। हालांकि, आज मंदिर में चंद शासकों द्वारा प्रतिष्ठित कोई भी मूल मूर्ति मौजूद नहीं है।

सारांश मुनगली

नंदादेवी उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक हैं, जिनकी पूजा का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है। अल्मोड़ा का नंदादेवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सत्ता, लोकश्रद्धा और ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी स्थल है। आज जो मूर्तियाँ मंदिर में प्रतिष्ठित हैं, वे नंदादेवी के प्रति असीम श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं, श्रद्धा की अनवरत परंपरा का प्रतीक हैं –एक ऐसी विरासत का प्रतीक हैं जो सदियों से संजोई जा रही है।

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