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नंदादेवी मंदिर ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी स्थल भी है।

अल्मोड़ा का नंदादेवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लोकश्रद्धा सत्ता, और ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी स्थल भी है।इस मंदिर का इतिहास न केवल धार्मिक परंपराओं का दर्पण है, बल्कि क्षेत्र के राजनैतिक और सांस्कृतिक विकास की गाथा भी प्रस्तुत करता है।

कौशल सक्सेना

चंद शासनकाल में राजा उद्योत चंद ने वर्ष 1690-91 में यहां पर दो शिव मंदिर उद्योतचंदेश्वर तथा पार्वतेश्वर बनवाये। राजा दीपचंद ने बाद में पार्वतेश्वर मंदिर से जुड़ा एक और मंदिर बनवाया जो बाद में दीपचंदेश्वर कहलाया । गोरखा शासनकाल में यह परिसर दीपचंदेश्वर परिसर कहलाता था। अंग्रेजी शासनकाल में तीनों मंदिरों का समूह और परिसर नंदादेवी मंदिर कहलाने लगा।
अंग्रेजों द्वारा अल्मोड़ा पर अधिकार किये जाने के बाद वर्ष 1816 में तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने मल्ला महल से देवी मंदिर की मूर्तियों को इस मंदिर में स्थापित करवाया था।
वर्ष 1815 में अल्मोड़ा नगर में आक्रमण के समय अंग्रेंजों ने पहले सिटोली, फिर हीराडूंगरी और बाद में दीपचंदेश्वर मंदिर परिसर में अपनी तोपों को जमाया था। यहीं से अंग्रेंजों ने गोरखों के लालमंडी किले पर अन्तिम आक्रमण किया था और अन्तगोत्वा नगर पर अधिकार कर लिया था।
1883 में अल्मोड़ा में इलबर्ट बिल कर समर्थन करने के लिए पहली सभा यहीं हुई थी।
1925 से पूर्व यहां खेत तथा फुलवाड़ी थीं।
1913 में स्वामी सत्यदेवी परिबाज्रक ने यहां सभा की। लाला लाजपत राज ने यहीं से हरिजनोद्धार का आव्हान किया।
1922 में मोतीलाल नेहरू ने यहां से ओजस्वी भाषण दिया तथा नंदादेवी के प्रांगण में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की अपील की।
26 जनवरी 1930 को यहा्ं सर्व प्रथम कुमाउ केसरी बद्रीदत पांडे ने ध्वजारोहण किया था।
एक वर्ष बाद पं जवाहरलाल नेहरू ने यहां से भाषण दिया और शपथ दिलवाई।
26 मई 1930 को नगर के प्रसिद्ध झंडा सत्याग्रह के समय नगर पालिका के लिए जलूस प्रखर स्वतंत्रता सेनानी विक्टर मोहन जोशी के नेतृत्व में यहीं से प्रारम्भ हुआ। 29 मई को कुमाउं केसरी बद्रीदत पांडे जी के नेतृत्व में भी दल यहीं से रवाना हुआ था।
1935 मे अल्मोड़ा की जनता की ओर से पंडित गोविन्द बल्लभ पंत का सार्वजनिक अभिन्ंदन इसी स्थान में हुआ।
स्वतंत्रता से पहले अली बन्धू मौलाना मेाहम्मद अली और शौकत अली, एम आर मसानी और युसुफ मेहर अली, जवाहरलाल नेहरू, राम मनेाहर लोहिया, विजय लक्ष्मी पंडित, कैलाशनाथ काटजू ,कामरेड पीसी जोशी, हृदयनाथ कुंजरू, जमनालाल बजाज, आचार्य कृपलानी, कमल नयन बजाज, बदरीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत, विक्टर मोहन जोशी, लाला चिरंजीलाल साह वकील और गुरूदास साह जी जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रखर भाषणों का यह परिसर गवाह रहा है।
देश की स्वतंत्रता की प्रथम भोर पर 15 अगस्त 1947 को नगर में ऐतिहासिक प्रभात फेरी इसी स्थान से प्रारम्भ हुई थी।
स्वतंत्रता के पश्चात भी अनेक महान और प्रखर वक्ताओं के ओजस्वी भाषणों का यह स्थल केन्द्र रहा है जिनमें हैं- सर्व श्री मोरारजी देसाई, डा0 कर्णसिंह, चन्द्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी, माधव सदाशिव गोलवलकर, श्रीमती सरोजनी नायडू, राजनारायण, राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया, अजित प्रसाद जैन, अटल बिहारी बाजपेयी, मधु दण्डवते, नारायण दत्त तिवारी, कृष्ण चन्द्र पन्त आदि प्रमुख रहे हैं।

वर्ष 2000 में कुमाउं की ऐतिहासिक नंदा राजजात का प्रारम्भ भी महामंडलेश्वर परेश यति ने इसी प्रांगण से किया था। वर्ष 1982 में इस स्थान के महत्व को देखते हुए पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया ।

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