Himvan

बाबा नीब करौरी की लीला स्थली है कैंची धाम

हल्द्वानी से अल्मोड़ा की ओर मोटर मार्ग पर भवाली से थोड़ी ही दूरी पर इठलाती बलखाती एक छोटी सी नदी नैनीताल एवं अल्मोड़ा जनपदों की सीमा रेखा को खींचती हुई बहती है। इस नदी को बाबा नीम करोली ने उत्तरवाहिनी नाम दिया। उत्तर वाहिनी के तट पर भवाली से सात किमी आगे अल्मोड़ा की ओर मोड़ घूमते ही सिन्दूरी...

आध्यात्मिक ऊर्जा का केन्द्र है कसार देवी- कालीमठ पर्वत श्रृंखला

कसार देवी-कालीमठ पर्वत श्रृंखला घने वृक्षों से आच्छादित प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण एक शांतिप्रद रमणीक स्थल है जो ज्ञान की तलाश कर रहे साधकों को बर्बस अपनी ओर आकर्षित करता है। हिमालय की बर्फीली पर्वत श्रृंखलाओं को निहारने एवं आध्यात्मिक शांति की तलाश में जब-तब विश्व प्रसिद्ध चिन्तक कालीमठ पर्वत...

ऐतिहासिक धरोहरों की अनूठी और गौरवशाली परंपरा है— बिरखम

उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र में इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि रास्तों पर खड़े पत्थरों में भी जीवित है। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में से एक बेहद अनूठी और गौरवशाली परंपरा मिलती है—’वीर खंभ’ या बिरखम की स्थापना। उत्तर- मध्यकाल से ही इन प्रस्तर स्तम्भों को बिरखम नाम से जाना जाता...

कुमाऊँ की आराध्य देवी हैं – हाट कालिका गंगोलीहाट

यूँ तो कुमाऊँ का कण-कण सौन्दर्य से परिपूर्ण है लेकिन कुछ स्थल ऐसे भी हैं जहा जाकर मन सम्मोहन की सीमा में पहुंच जाता है । पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट कस्बे का काली मंदिर इनमें से एक है। गंगोली कस्बे की खूबसूरत घाटी में बना हाट कालिका मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं तथा साधकों को श्रद्धा से वशीभूत करता...

अल्मोड़ा नगर के रक्षक हैं अष्ट भैरव

उत्तराखंड में सर्वहारा वर्ग के सर्वप्रिय यदि किसी देवता का उल्लेख करना हो तो निश्चित ही वह देवता हैं-भैरव। पर्वतीय समाज में उन्हें लौकिक देवता का स्थान मिला हुआ है। उनके छोटे- छोटे मंदिर निर्जन वनों से लेकर गांव- समाज के आसपास की बसासत तक सभी जगह मिलते हैं। शिव रूप भैरव को ना केवल उग्र देवता के रूप...

ऐतिहासिक है अल्मोड़ा का शै भैरव मंदिर

शिव रूप भैरव रक्षक देवता हैं। भारत वर्ष के अनेक किलों में उनकी स्थापना गढ़ के रक्षक के रूप में की गई है। अल्मोड़ा नगर में भी रक्षक देवता के रूप में उनकी स्थापना नगर के प्रमुख स्थानों में अष्ट भैरव रूप में की गई थी। अल्मोड़ा में अष्ट भैरव मंदिरों की स्थापना का सम्बन्ध चंद शासक उद्योत चंद (1678-98)...

कुमाऊँ के देवालय – निर्माण तथा परिरक्षण

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में प्राचीन मंदिरोंके निर्माण की परम्परा लगभग सातवीं शती से निरन्तर पल्लवित होती रही है। इस क्षेत्र में मंदिर निर्माण क्रमानुसार लकड़ी, ईंट तथा मजबूत पत्थरों इत्यादि से हुआ। लकड़ी की प्रकृति दीर्घजीवी न होने के कारण काष्ठ निर्मित मंदिरों के निर्माण की परम्परा का अवसान...

मिरतोला आश्रम: आत्म निर्भर पर्वतीय ग्रामीण विकास का आदर्श रहा है

हिमालय की गोद में, अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ मार्ग पर स्थित मिरतोला आश्रम (उत्तर वृन्दावन) केवल एक आध्यात्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि पर्वतीय विकास की एक अनूठी प्रयोगशाला भी है। समुद्र तल से 2160 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह आश्रम पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक विकास-तीर्थ के रूप में उभर कर आया है। कौशल सक्सेना...