उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र में इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि रास्तों पर खड़े पत्थरों में भी जीवित है। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में से एक बेहद अनूठी और गौरवशाली परंपरा मिलती है—’वीर खंभ’ या बिरखम की स्थापना। उत्तर- मध्यकाल से ही इन प्रस्तर स्तम्भों को बिरखम नाम से जाना जाता है लौकिक कथाओं के नायक वीरों की शौर्य गाथाओं के ये लघु कीर्ति स्तम्भ हैं।

बिरखम केवल एक नक्काशीदार पत्थर नहीं हैं, बल्कि यह उन गुमनाम शूरवीरों की शौर्यगाथा हैं जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा तथा जातीय गौरव के लिए युद्ध के मैदान में अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
प्राचीन काल में जब कोई योद्धा युद्ध में असाधारण वीरता दिखाते हुए अथवा लोक और समाज के कल्याण के लिए दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणो को उत्सर्ग कर देता था अथवा वीरगति को प्राप्त होता था, तो उसकी स्मृति और सम्मान में राज्य या उसके परिवार द्वारा एक पत्थर का स्तंभ स्थापित किया जाता था। चंदकालीन अभिलेखों और ताम्रपत्रों में इन्हें ‘कीर्ति स्तंभ’ भी कहा गया है। ये स्तंभ आमतौर पर गांवों के प्रवेश द्वार पर अथवा ग्राम की सीमाओं पर पानी के स्रोतों नौलों-धारों के पास, मंदिर परिसरों या पुराने युद्ध मैदानों के समीप स्थापित किए जाते थे ताकि आने-जाने वाली पीढ़ियां इन वीरों के बलिदान को याद रख सकें। ऐसे बिरखम भी मिले हैं जिनमें लेख उत्कीर्ण किए गए हैं। सही तो यह है कि यह शूरवीर पूर्वजो की स्मृति को चिरस्थाई बनाने और श्रद्धा व्यक्त करने की अपने वंश की गौरव शाली परम्परा को प्रदर्शित करने का एक तरीका था ।

कुमाऊँ में प्राप्त बिरखमों पर प्रकाश डालते हुए पद्मश्री डा0 यशोधर मठपाल ने उल्लेख किया है कि पिथौरागढ तथा नैनीताल जिलों में समूह के रूप में कई बिरखम एक साथ देखने में आए हैं। मन्दिर परिसरों के अतिरिक्त वृक्षों के नीचे, और श्मशान स्थलों के समीप भी बिरखम मिले हैं। कभी हल्द्वानी के डी के पार्क में भी ऐसे कई बिरखम थे। अल्मोड़ा जनपद का बरखम एक प्रसिद्ध गांव है। यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन बिरखमों की बहुतायत है। अल्मोड़ा के पास झांकरसैम मंदिर परिसर,डंडेश्वर ,आरतोला,मनीआगर, पातली बगड़ , एनटीडी आदि अनेक स्थानों पर भी बिरखम मिले हैं। इतिहासकार एवम् पुराविद डा0 यशवंत सिंह कठोच ने अपनी पुस्तक मध्य हिमालय का पुरातत्व में मंदिरों के प्रांगणों में बहुतायत से उपलब्ध बिरखमों की संख्या के कारण इन्हें मुख्य मंदिर के स्थापत्य का अनिवार्य अंग भी कहा है। उन्होंने लिखा है-ये स्तम्भ निश्चय ही प्रधान मंदिर के सहायक स्थापत्य की श्रेणी में आते हैं
राज्य की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करना अत्यंत आदरभाव से देखा जाता था। अपने वंश के ऐसे वीरों की स्मृति को बनाये रखने, उनका नाम इतिहास में दर्ज कराने और आने वाले समय की पीढ़ियो को इतिहास और शूरता का बखान करने वाले उनके कार्यो से परिचित कराने की यह परम्परा केवल उत्तराखंड नहीं अपितु देश-विदेश के अनेक देशों के इतिहास में अनेक स्थानों पर दर्ज है। मृतक शूरवीरों की अंत्येष्ठि के बाद स्मारक, चबूतरा या स्तंभ बनाने की प्रथा देश के अन्य भागों की तरह ही उत्तराखंड में भी थी।
इन स्तंभों पर मुख्य रूप से शूरवीरों कीआकृतियां उकेरी जाती थीं, योद्धा को एक हाथ में भाला या तलवार और दूसरे हाथ में घोड़े की लगाम थामे हुए इन स्तम्भों पर उकेरा जाता था। युद्ध के दृश्य तीर-धनुष और ढाल के साथ लड़ते हुए योद्धा का उत्कीर्णन भी प्रायः मिलता है। यद्यपि अधिकांश बिरखम पर लेख अंकित नहीं हैं, लेकिन कुछ बिरखम ऐसे भी मिले हैं जिन पर लेख अंकित हैं।

मध्य हिमालयी क्षेत्र में स्थापित बिरखम स्वरूप एवं आकार की दृष्टि से तीन प्रकार के हैं। इनमें स्तंभ सदृश्य बिरखम एक ही शिला से बनाए गए हैं ना कि कई शिलाओं को जोड़ कर जो भूमि सतह से एक मीटर तक उठे हुए ही होते हैं। स्थायित्व की दृष्टि से जमीन में लगभग पैंतालीस सेमी तक अन्दर गढ़े हुए हैं तथा आधार से शीर्ष तक चतुष्फलकीय हैं। इनमें मध्यवर्ती संरचना देवालयों की तरह भी बनाई जाती थी। जिनमें अश्वारोही योद्धा को प्रदर्शित किया गया है। कुछ का आकार शिखर की ओर छोटा भी हो गया है। अधिकांश उत्कीर्णन मध्य भाग में किया गया है। लगभग सभी स्थानीय शिलाओं से बने हैं तथा निर्माण कार्य में समानता है। बिरखम शिलापट के समान दो फलक वाले भी मिले हैं। इनको बनाने के लिए मंदिरों के विभिन्न अंगों से प्रेरणा ग्रहण की गई है। इन बिरखम के शीर्ष पर मंदिर स्थापत्य के अनुरूप आमलक, कलश एवं लिंग स्थापित किए गए हैं।प्रायः स्थानीय पत्थरों से ही बनाए गए तथा बलुआ पत्थर और क्वार्ट्ज का बहुतायत से प्रयोग किया गया।
विद्वानों का मानना है कि बिरखमों का निर्माण अति महत्वपूर्ण संरचनाओं एवं मार्ग संकेतकों के रूप में भी किया जाता था। यात्रियों को मार्ग से भटकने से बचाना भी संभवतः इनका उद्देश्य रहा होगा। नजदीक के गांव, धर्मशाला, मंदिर, किले, नौलों की जानकारी भी इनसे हो जाती थी। ग्रामीण क्षेत्रों के सीमांकन एवं प्रतीकों के रूप में भी इन बिरखमों का निर्माण किया गया था।

समय के साथ इन बिरखमों का स्वरूप सिर्फ ऐतिहासिक अवशेषों के प्रतीक होने तक सीमित नहीं रहा; ये कुमाऊँ की लोक-आस्था और धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन गए।इन बिरखमों को धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है। कहीं-कहीं विशेष पर्वों पर इन स्तंभों को पवित्र जल से स्नान करा कर धूप दीप और तिलक लगाकर पूजन भी किया जाता है। लोग मन्नत मांगने और अपनी रक्षा के लिए पूजा करने के लिए दूर-दूर से इन स्थानों पर आते हैं।
कुछ क्षेत्रों में इनकी पूजा बेताल या संरक्षक देवता के रूप में की जाती है। चम्पावत से लगभग 18 किमी दूर लोहाघाट विकास खंड के गलचौड़ा नामक स्थान पर बिरखम की मां भगवती के बेताल के रूप में पूजा होती है । गलचौड़ा में इन बिरखमों को वीर गण के रूप में पूजा जाता है।

लेकिन उचित देखरेख और संरक्षण के अभाव में कई महत्वपूर्ण बिरखम अपनी पहचान खो रहे हैं। मौसम की मार और जागरूकता की कमी के कारण पत्थरों पर उकेरी गई अमूल्य आकृतियां धीरे-धीरे धुंधली हो रही हैं।

ये बिरखम उत्तराखंड के वीरों के उस दौर की गवाही देते हैं जब देश , समाज और स्वाभिमान के लिए प्राण न्याछावर कर देना आम बात थी। इन धरोहरों को सहेजना न सिर्फ हमारे इतिहास को जिंदा रखने के लिए जरूरी है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढ़ियों को शूरवीरों के गौरवमयी इतिहास से जोड़ने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
यदि आप कभी कुमाऊँ के ग्रामीण अंचलों की यात्रा करें, तो रास्ते के किनारे खड़े इन मौन पत्थरों को केवल अर्थहीन पत्थर न समझें; इनके पास ठहरें, क्योंकि इनके भीतर इतिहास की एक गौरवशाली कहानी सोई हुई है।



