हिमालय में ब्रिटिश विरासत और स्थापत्य का संगम
अल्मोड़ा हिमालय की गोद में बसा एक सुरम्य नगर है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। लेकिन इस सुन्दर नगर छिपे हुए में अनेक खूबसूरत बंगले हैं जो औपनिवेशिक युग की याद दिलाते हैं जब अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया था। अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के साथ ये बंगले अतीत की झलक पेश करते हैं और इतिहास का स्वाद लेने के लिए एक अनूठा आवास अनुभव प्रदान करते हैं।

19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने अल्मोड़ा आवास के रूप में चुना, तब उन्होंने यहाँ एक विशिष्ट वास्तुकला को जन्म दिया, जिसे आज हम ‘पहाड़ी-विक्टोरियन’ शैली के रूप में पहचानते हैं। अल्मोड़ा विजित करने के बाद अंग्रेजों की सबसे बड़ी जरूरत अपने अधिकारियों के आवास के लिए ब्रिटिश शैली के भवनों का निर्माण रहा जिन्हें उन्होने स्थानीय शैली के सम्मिश्रण से और अधिक भव्य और स्थानीय जलवायु के अनूकूल बनाने की कोशिश की। ब्रिटिश युग के बंगले भारतीय और ब्रिटिश स्थापत्य शैली का सामंजस्यपूर्ण मिश्रण हैं। बंगले मुख्य रूप से 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए थे और ब्रिटिश अधिकारियों के निवास के रूप में प्रयोग किये गये थे। उन्हें क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल विशाल, आरामदायक और स्वास्थ के लिये अनूकूल अच्छी तरह हवा -धूप प्राप्त करने के लिए के लिए डिजाइन किया गया था। प्रकृति के साथ जीवन ही इन बंगलों के स्थापत्य का मूल मंत्र था।
अल्मोड़ा नगर में आज भी ऐसी कई इमारते हैं जो अपनी भव्यता के साथ ब्रिटिश काल के स्थापत्य की जीवंत कथायें कहती है। इनमें सेंट माकर्स बंगला जो अब टैगोर हाउस के नाम से जाना जाता है तथा इसमें वर्तमान में छावनी परिषद अल्मोड़ा का कार्यालय है, प्रसिद्ध है। अल्मोड़ा का सर्किट हाउस भी भव्य इमारत है जिसमें कभी हेनरी रैमजे का आवास था। ओकले हाउस, जिसमें होली हिमालय के लेखक पादरी ओकले रहते थे तथा जिसे अब भगनी निवेदिता काटेज के नाम से जाना जाता है , अपने समय की प्रसिद्ध इमारत थी। यही नहीं थाम्पसन हाउस में कभी स्वामी विवेकानंद के निर्देश पर प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन हुआ था तथा जहां स्वामी जी अपने शिष्यों के साथ अल्मोड़ा प्रवास के दौरान वर्ष 1898 में रूके थे। इसी भवन में नोबल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक रोनाल्ड रास का जन्म भी हुआ था। विवेकानंद कृषि अनुसंधानशाला के संस्थापक प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक बोसी सेन का आवास कुंदन हाउस भी अत्यंत भव्य ,संतुलित और विशाल है। मल्ली बाजार स्थित डिग्गी बंगला भी प्रसिद्ध भवन है। यह सभी भवन एंग्लो-इंडियन आर्किटेक्चर के अल्मोड़ा में सुंदर प्रतीक हैं।
इन सुन्दर भवनों की ऊँची छतें (High Ceilings) कमरों को हवादार रखती हैं, और बड़े कांच की दो पटों वाली खिड़कियां, सामान्य रूप से बनाई जाती थीं, ताकि सर्दियों की धूप का अधिकतम लाभ उठाया जा सके।

फायरप्लेस (अंगीठी): हर कमरे में पत्थर की अंगीठी इन बंगलों की पहचान है, जो ठंडी रातों में एक विंटेज एहसास दिलाती है।
इन बंगलों में देवदार, साल, तुन आदि की की लकड़ी, चूना पत्थर और टिन की चादर का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया गया है। देवदार की लकड़ी न केवल मजबूती देती है, बल्कि इसकी प्राकृतिक सुगंध कमरों को ताजगी से भरे रखती है।
अधिकांश बंगलों की छतें बनाने में इंगलैड से मंगाई गई नालीदार टिन की चादर अथवा सुन्दरता से कटी हुई स्लेटों का प्रयोग किया गया है। जिनके नीचे गर्मी की तपिश से बचाने के लिए लकड़ी के तख्त और बल्लियों का प्रयोग किया गया था।
भवन के सामने भव्य और विशाल बारामदा और बागान बनाए गए हैं। खुला बारामदा जो प्रायः पत्थरों को काट कर बनाये गये स्तम्भों पर आधारित होता था, में बैठकर गुनगनाती धूप का आनंद लिया जा सकता था तथा मिलने आने वाले आगुन्तकों के लिए प्रतीक्षा स्थल का भी काम करता था। चारों ओर फैली हरियाली हर बंगले की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। पोर्टिको के रूप में काफी बड़ा स्थान छोड़ा जाता था।
अधिकांश बंगले एक मंजिल के थे, लेकिन भव्य और सुंदर बनाए गए थे। यही नहीं, इसी विधा और स्टाइल का पालन वन विभाग के अधिकांश विश्राम गृहों के निर्माण में भी किया गया ।
अल्मोड़ा के ये बंगले केवल पत्थर और लकड़ी के ढांचे नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय कारीगरी और ब्रिटिश डिजाइन का एक शानदार संतुलन हैं। इन बंगलों के निर्माण के साथ ही अल्मोड़ा में भवन निर्माण की नई शैली भी विकसित हुई जिसपर ब्रिटिश प्रभाव और तकनीकी को स्पष्ट देखा जा सकता है तथा ये पूर्ववर्ती पहाड़ी शैली के भवनों से पूर्णतः भिन्न् थी।





