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उत्तराखन्ड के ताल वाद्य – “दमुआ-ढोल”

भारतीय आध्यात्मिक चेतना में नटराज शिव का आवास कैलाश पर्वत पर स्थापित है और हिमालय का समूचा शिवालिक अंचल शिव की रंगस्थली है। संगीत के आदि प्रतिपादक आदिदेव शिव के कण-कण में रमे होने के कारण ही देवभूमि का लोकजीवन भी नाद ब्रह्म से परिपूर्ण है। शिव तथा शक्ति के प्रतीक भारतीय संगीत में ‘ता’ तथा ‘ल’ माने गए हैं। इस आधार पर शब्द ‘ताल’ शिव तथा शक्ति के संयोजन का परिणाम है। जहाँ लय जीवन की गति को व्यक्त करती है, वहीं ताल काल की गति को आबद्ध करती है। सृष्टि के जड़-चेतन सभी काल के सिद्धांत से आबद्ध हैं।

वैदिक साहित्य में अनेक अवनद्ध ताल (नगाड़ा वाद्य) पक्षों के बीच ताल देने के लिये प्रयुक्त किए जाते हैं। यथा दुन्दुभी का उल्लेख मिलता है।

कौशल सक्सेना

सिंधु घाटी सभ्यता में भी तालवाद्यों की उपलब्धता के प्रमाण हैं। उत्खनन से प्राप्त एक मूर्ति में एक महिला को डमरू लिए हुए उकेरा गया है। ईसा से 200 वर्ष पूर्व भरत मुनि के रचित नाट्यशास्त्र में ‘कुतुप’ का वर्णन है। दक्षिण भारत में इस ‘कुतुप’ के समान ‘मेलम’ भी संयोजित किए जाते थे। कुतुप तथा मेलम वाद्य वृन्द समूह थे तथा इसमें ढोलक तथा हडक्का (हुडका) अवनद्ध ताल वाद्यों के रूप में प्रयोग किये जाते थे।

ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों के तमिल ग्रंथों में ‘मथलम’ नामक अवनद्ध तालवाद्य का वर्णन है जो ढोल के समान था। संगीत जगत में स्थापित एक तथ्य के अनुसार अवनद्ध वाद्य अपने प्रारम्भिक स्वरूप में भोजन पकाने अथवा भण्डारण के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले पात्र रहे होंगे जो मढ़े जाने पर वाद्य यन्त्रों में परिवर्तित हो गए। उत्तराखण्ड के अंचलों में पाए जाने वाले दमुआ-नगाड़े इस धारणा को पुष्ट करते हैं।

कौशल सक्सेना

अवनद्ध वाद्य का विस्तृत विवरण कत्यूरी शासन काल में रचित ‘ढोल सागर’ में मिलता है। कत्यूरी शासन काल तक वर्तमान गढ़वाल तथा कुमाऊँ मण्डल एक ही इकाई के अधीन थे। यहाँ के सांस्कृतिक लोकजीवन में भी समरूपता रही। कत्यूरी राजा दुलाधामध्येशाह के गुरु रखेणदास द्वारा रचित ‘ढोल-सागर’ उत्तराखण्ड के लोकवाद्यों – ढोल- का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। अल्मोड़ा के समीप लाखुड्यार में पाए गए शैलचित्रों में एक ढोल वादक का अंकन उपलब्ध है।

सिंधु गंगोला

डा0 शिवानंद नौटियाल के अनुसार ढोल मोटी खाल की होती है, जिसे हम नर कह सकते हैं। ढोल के खोल के बीचोबीच लगभग २ इंच चौड़ी पीतल की पट्टी चिपकी होती है जिसे विजेसार कहते हैं। विजेसार के दोनों सिरों को ताँबे की तीन मेखलाओं से जोड़ दिया जाता है। यही तीन मेखलाएँ त्रिवेव-ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं तथा विजेसार त्रिदेव की सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। यह भव-शक्ति विश्व रूपी ढोल को नियंत्रण में रखती है। ढोलसागर के अनुसार ढोल की आध्यात्मिक पीठिका यही है। ढोल का निर्माण प्रलय के पश्चात् सृष्टि की निस्तब्धता भंग करने के लिये ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा पार्वती जी ने किया तथा इस नवनिर्मित ढोल का नाम शिवजन्ती (शिव-जंत्री) रखा गया और इसको सर्वप्रथम शिव जी ने ही धारण कर सृष्टि का मनोरञ्जन किया था। ढोलसागर के अनुसार ढोल का आध्यात्मिक स्वरूप इस प्रकार है-ढोल-दमुआ को आहत कर विभिन्न तालों का लोक वादकों द्वारा अवतरण किया जाता है। ये दोनों यंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। दमाऊ, जिसे स्थानीय भाषा में दमुआ कहा जाता है, नक्कारे का छोटा रूप है। ढोल और दमाने को क्रमशः पुरुष और स्त्री मानकर इस जोड़े को ‘मिथुन युगल’ माना जाता है जो एक दूसरे के पूरक हैं।

ढोल सागर में ढोल के अवयवों को देवपुत्रों के तुल्य माना गया है। ग्रंथ में प्रदत्त विवरण के अनुसार:

“आपु पुत्रं भवे ढोलं, ब्रह्म पुत्रं न डोरिका।

पौन पुत्र भवे नादम्, भीम पुत्र गजावलम॥

विष्णुपुत्रं भवे पुड़ी, नागपुत्रं कुण्डलिका।

कुरुभ पुत्रं कन्दोरिका, गुणी पुत्र कर्णिका॥”

उक्त आधार पर डेढ़ फीट तक लम्बी डोरिका, नाद, गजावल (बजाने की यष्टि), पुड़ी, कुण्डली तथा कन्दोरी ढोल के अवयव हैं। ढोल की पुड़ी बकरी तथा बारहसिंघे की खाल से मढ़ी जाती है। दमुआ (दमाऊ) ताँबे-पीतल से निर्मित होता है तथा इस वाद्य में बाईं पुड़ी भैंस की खाल की मढ़ी जाती है।

ढोल की पुड़ी के रन्ध्रों के नाम इस प्रकार हैं: 1. सरस्वती, 2. सत्, 3. पाशमतो, 4. दुर्गा, 5. वैष्णवी, 6. जगती, 7. गणेश, 8. गोपी गोपाल आदि।

दमुआ (दमाऊ) ताँबे के एक फुट व्यास तथा पौन फुट गहरे कटोरे नुमा पात्र पर बैल का चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। दमाये को कन्दोरिका की सहायता से गले में टाँग कर दो पतली यष्टिकाओं से बजाया जाता है। ढोलों के पूजन का विधान शास्त्रसम्मत है। वसन्त ऋतु में दमुआ-ढोल का पूजन किया जाता है। शुक्ल पक्ष में हस्त तथा चित्रा नक्षत्र की तिथियों पर विद्वान पुरोहित गाय के गोबर से लिपी भूमि पर तीन मण्डल बनाएंगे। प्रथम मण्डल पर मधु-हलवा (अपूपा) चढ़ाया जाएगा। द्वितीय मण्डल पर पूड़ी तथा पुआ चढ़ाए जाएंगे तथा तृतीय मण्डल में अन्नपिण्ड अर्पित किया जाएगा।

राजा विक्रमादित्य के दरबारी कलावन्त भगवानदास द्वारा प्रतिपादित मध्यमानी शैली की चार उपशैलियाँ – सूतिका, बाकुली, सेन्चुरी तथा झाड़खण्डी बताई गई हैं। इनमें से सूतिका एवं बाकुली उपशैलियों की उत्तराखण्ड के ढोल वादन में दृश्यता है। मध्यमानी शैली की बधाई, घुयेल, धरहरी, जौरास, रहमानी, गोड़, चारतालिम आदि ताल आज भी सुने जा सकते हैं।

कौशल सक्सेना

गोड़: गोड़ वादन में ताल का कलापक्ष मुखरित हो उठता है। ताल की लय विलम्बित होती है। ढोली तथा दमात्री अपनी-अपनी कला दक्षता प्रस्तुत करते हैं।

रहमानी: यह ताल विजय यात्रा के प्रतीक रूप में बजाई जाती है। मार्ग की स्थिति के अनुसार ताल के बोल बदलते रहते हैं। चढ़ाई वाले मार्ग पर ‘उकान’ बजाई जाती है, उतार वाले मार्ग पर ‘उन्दार’ बजती है, नदी तट पर ‘गड़ छल’ बजाया जाता है और समतल मार्ग पर ‘तैच्चार’ बजाई जाती है। वर्तमान में उत्तराखण्ड में बारातों के समय ये तालें बजाई जाती हैं।

चारतालिम: यह रौद्र प्रकृति की अप्रचलित ताल है। ढोल सागर के अनुसार देवाधिदेव शिव ने इसी ताल में ताण्डव नृत्य किया था।

झाड़-खण्डी: तांत्रिक तालें डंगरियाओं द्वारा जागर जैसे आयोजनों पर बजाई जाती हैं। इसके अन्तर्गत पूसा, हापूसा, नामणी, नाराण आदि तालें आती हैं।

दमुआ-ढोल की इन तालों की संरचना को वंशानुगत परंपरा के आधार पर उत्तराधिकार में सिखाया जाता है। ढोली तथा डंगरी नाम से जाने जाने वाले ये कलाकार ढोल निर्माण तथा वादन की गूढ़ विद्या के वाहक हैं। उत्तराखण्ड के पर्वतीय लोकसंगीत के अनन्य वाद्य दमुआ-ढोल की गूंज ने भारतीय संगीत के ताल पक्ष को सम्पन्न करने में अपना योगदान दिया है।

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श्री विनोद पंत एवं कौशल सक्सेना का यह लेख मूल रूप से पुरवासी अल्मोड़ा में प्रकाशित हुआ था। जिसे पुरवासी से आभार सहित लेकर पुनः प्रकाशित किया गया है।

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