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कुमाऊँ में भी पल्लवित हुई थी ताम्र युगीन संस्कृति

हजारों वर्ष पूर्व कुमाऊँ मंडल में पल्लवित हुई ताम्र युगीन संस्कृति के अवशेष अल्मोड़ा के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इन अवशेषों के रूप में तांबे की बनी ऐसी मानवाकृतियां हैं जिन्हें अल्मोड़ा तथा पिथौरागढ़ जिलों से खोजा गया था।

पर्वतीय क्षेत्र से वर्ष 1986 में ताम्र संस्कृति का प्रथम उपकरण एक ताम्रमानव आकृति के रूप में हल्द्वानी से प्राप्त हुआ। इस ताम्र मानवाकृति को कोई व्यक्ति अल्मोड़ा नगर में कबाड़ के रूप में बेच गया था। वर्ष 1986 में इस लेखक ने हल्द्वानी में ताम्रयुगीन मानवाकृति का पता लगाकर पर्वतीय क्षेत्र में समृद्ध ताम्र संस्कृति की अवधारणा को पुष्ट किया। यह आकृति गंगाघाटी से मिलने वाली ताम्रसंस्कृति के अवशेषों जैसी ही थी। डा0 एम पी जोशी ने बनकोट पिथैारागढ़ से ऐसी 8 और ताम्र मानवाकृतियां खोज कर ताम्रसंस्कृति की अवधारणा पर पुष्टि की मोहर ही लगा दी। बनकोट की ताम्र मानवाकृतियों ने इस धारणा को भी बल दिया कि ईसा पूर्व की द्वितीय शती में पर्वतीय लोग ताम्र अयस्कों की निष्कर्षण तकनीक में भी प्रवीण हो चुके थे। इस खोज के बाद कुमाऊँ में ताम्रयुगीन सभ्यता भी निरी कोरी कल्पना नहीं रही थी।

राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा

इस के बाद पुराविदों द्वारा कुमाऊँ मंडल में ताम्रसंचयी संस्कृति की अवधारणा को पुष्ट करने के प्रयास प्रारम्भ हुए। हल्द्वानी से ताम्र मानव आकृतियों का मिलना इस क्षेत्र की संस्कृति तथा पुरातत्व के लिए अद्भुत घटना थी। बाद में बनकोट तथा नैनी पातल जिला पिथौरागढ़ से ऐसी अन्य ताम्र मानवाकृतियां प्राप्त हुईं। इस प्रकार ताम्रसंचयी संस्कृति के उपकरणों के रूप में कुमाऊं मंडल में अभी तक चौदह ताम्र मानव आकृतियां प्राप्त हो चुकी हैं। हल्द्वानी से प्राप्त मानवाकृति उत्तर प्रदेश के गंगा कांठे से मिलनेवाली मानव आकृतियों जैसी ही हैं। इस आकृति का ऊपरी भाग सिर की तरह गोल है, नीचे दो लम्बे पैर हैं। लम्बाई 40 सेमी से ज्यादा है जबकि वक्ष सहित दोनों किनारे 38 सेमी लम्बे हैं। इस आकृति में वास्तविक हाथ-पैर के कोई निशान मौजूद नहीं हैं।

तांबे को पीट-पीटकर बनाई गई इस आकृति के किनारे चपटे और हल्के से धारदार हैं। इस उपकरण के प्रयोजन की जानकारी के अभाव में इसे अपने रूप के आधार पर मानवाकृति नाम दिया गया है। मूर्ति पूजा के प्रारम्भ होने से बहुत पहले इस प्रकार की मानवा आकृतियां मानवीय आस्थाओं से सम्बन्धित होकर पूजित होती रही हैं। इसी प्रकार की पाँच मानव कृतियाँ वर्ष 1999 में नैनीताल से प्राप्त हुई थीं। बनकोट जिला पिथौरागढ़ से प्राप्त आठ मानव कृतियां पत्थर निकालने वाली एक खान के पास से प्राप्त हुईं। इन मानवाकृतियों के सिर के नीचे दोनों ओर भीतर की ओर मुड़े हुए हाथ और उनके नीचे दो लम्बे नुकीले पैर हैं। हल्द्वानी से प्राप्त मानवा आकृति के हाथ दोनों ओर अन्दर की ओर घूमे हुए हैं जबकि शेष मानवा कृतियों के हाथ सीधे और सपाट हैं। पर्वतीय क्षेत्र में तांबे के खानें पहले से ही मौजूद रही हैं, जिनसे पूर्व में भी तांबा निकाला जाता था। प्रतीत होता है कि तत्कालीन ताम्र प्रयोक्ता अपने प्रयोग के लिए तांबा स्थानीय खानों से ही निकालते होंगे।

भारत वर्ष में ताम्रयुगीन उपकरण वर्ष 1822 से ही प्रकाश में आते रहे हैं किन्तु उनकी ओर सर्वप्रथम ध्यान वर्ष 1905 तथा 1907 में आगरा अवध प्रांत के जिला मजिस्ट्रेट विंसेट स्मिथ ने ही दिया। उस समय तक जो ताम्र आयुध मिले थे उनकी संक्षिप्त सूची प्रस्तुत करते हुए उन्होंने इस देश में सर्वप्रथम ताम्रयुग की कल्पना की। पहले अनुमान लगाये जाते थे कि तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश में ताम्रयुगीन उपकरण केवल उन क्षेत्रों में मिलते हैं जो गंगा कांठे वाले क्षेत्र अथवा सपाट भूभाग वाले मैदानी इलाके हैं। इससे पहले जो ताम्रयुगीन उपकरण मिले थे उनकी परिधि सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद और बदायूं से आगे पर्वतीय क्षेत्रों की ओर नहीं बढ़ सकी थी। हालांकि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से मिलने वाले प्राचीन शैलचित्रों से यह सम्भावना अवश्य व्यक्त की गयी थी कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही मानव विचरण करता था।

पहाड़ी क्षेत्रों से श्रृंखलाबद्ध रूप से मिलने वाले ताम्रयुगीन उपकरणों ने कुमाऊं मंडल में ताम्रसंचयी संस्कृति के पल्लवित रहे होने की अवधारणा को निश्चित रूप से पुष्ट कर दिया है। इस क्षेत्र से प्राप्त ताम्र उपकरणों में से कुछ को अल्मोड़ा तथा पिथौरागढ़ के संग्रहालयों में प्रदर्शित किया गया है। इतना ही नहीं, उस समय भी स्थानीय शिल्पी तांबे के निष्कर्षण की तकनीक में भी पारंगत थे। अनुमान है कि प्रचुर मात्रा में तांबे के उपलब्ध होने के कारण प्राचीन गंगा घाटी की ताम्र संस्कृति के वाहकों को भी यहीं से तांबा निर्यात किया जाता होगा।

प्रारम्भ से ही कुमाऊँ की ताम्र खदानों में व्यावसायिक स्तर पर तांबे का निष्कर्षण होता था। राई-आगर, बोरा-आगर, सीरा, असकोट, खरही एवं रामगढ़ में व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन करने वाली ताम्र खदानें रही हैं।

खेद जनक है कि लोगों को इन चीजों के महत्व की जानकारी नहीं है और वे इन महत्वपूर्ण अवशेषों को भी बाजार में पुराने तांबे के भाव बेच आते हैं। हो सकता है कि भविष्य में होने वाले योजनाबद्ध सर्वेक्षणों तथा उत्खनन आदि से यहां ताम्रसंचयी संस्कृति के अनजाने पृष्ठों पर भी विस्तृत सामग्री उपलब्ध हो जाये।

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