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कुमाऊँ में नंदा राजजात की परंपरा

नंदा राजजात गढ़वाल–कुमाऊँ की साझा सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक पहचान की सबसे विराट यात्रा मानी जाती है। कुमाऊँ में इसकी परंपरा, ऐतिहासिक घटनाओं और 2000 में पुनः प्रारंभ हुई भागीदारी को तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है—

नीरज अग्रवाल
  1. पृष्ठभूमि – कुमाऊँ में कत्यूरी और चंद नरेशों के काल से नंदादेवी को ईष्ट देवी के रूप में पूजे जाने के प्रमाण हैं, लेकिन उस समय की किसी विस्तृत राजजात के स्पष्ट उल्लेख का अभाव है। कुमाऊँ से राजजात में देवी की प्रतिमाओं, कटार और छत्र को भेजने की परंपरा सम्भवत: राजा बाज बहादुर चंद (1638-78) से शुरू हुई।
  2. परंपरा का ठहराव और पुनः प्रारंभ
    • राजा आनंद सिंह के बाद कुमाऊँ से राजजात भागीदारी नहीं हो पाई।
    • अंतिम बार 1925 में सहभागिता का उल्लेख है।
    • वर्ष 2000 में नौटी समिति के निमंत्रण पर इसे पुनः प्रारंभ किया गया, जिसके लिए अलग आयोजन समिति बनी और विस्तृत योजना तैयार हुई।
  3. 2000 की यात्रा का संचालन और आयोजन
    • वर्ष 2000 की कुमाऊँ राजजात यात्रा का राजा के सी सिंह बाबा की अगुवाई और सम्पूर्ण निर्देश में सम्पन्न् हुई। स्वंय के सी सिंह बाबा ने अल्मोड़ा नंदादेवी मंदिर से राजजात यात्रा मेें व्यक्तिगत भागीदारी की एवं सभी धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा किया।
    • राजजात यात्रा को सम्पन्न् करने के लिए मंदिर समिति से इतर एक नई समिति श्री नंदादेवी राजजात समिति बनाई गई जिसके निर्देशन में ही समूची यात्रा सम्पन्न हई।
    • नंदाराजजात यात्रा के लिए स्वर्ण प्रतिमा स्थानीय नंदादेवी निवासी स्वर्ण आभूषण निर्माता श्री नवीन वर्मा ने राजजात समिति को प्रदान की। जिसे छंतोली के साथ होमकुंड के लिए भेजा गया।
    • समूची यात्रा के आयोजन में श्री नंदादेवी मंदिर एवं नंदागीता भवन समिति , नगर के विभिन्न मंदिरों की प्रबन्ध समितियों, समाजिक संस्थाओं, प्रशासन, सांस्कृतिक दलों, और सुरक्षा बलों का सक्रिय भागीदारी एवं सहयोग रहा।
    • अल्मोड़ा से नंदकेसरी तक यात्रा मार्ग में पड़ाव पर, सांस्कृतिक कार्यक्रम, महिला भागीदारी, वृक्षारोपण, और गढ़वाल–कुमाऊँ यात्राओं का संगम हुआ।अल्मोड़ा से नंदादेवीराजजात यात्रा में अनेक संस्थाओं द्वारा निशुल्क जलपान का प्रबन्ध स्थान -स्थान पर किया गया था। नंदादेवी राजजात की छंतोली का पूजन कर बाल्मिकी सभा पातालदेवी की ओर से नगर की सीमा पांडेखोला में भावपूर्ण विदाई दी गई।
    • रास्ते में पड़ने वाले भेटा गांव के निवासियों ने ग्राम की सीमा के प्रारम्भ में देवी छत्र का ढोल नगाड़ो सहित स्वागत किया एवं समस्त ग्रामवासी ग्राम की सीमा के अन्त तक स्वंय विदाई देने के लिए सम्मिलित हुए थे।
    • इस यात्रा में लगभग 50,000 यात्री थे, कई महिलाएँ भी होमकुंड तक पहुँचीं।
हरीश भंडारी

नंदा राजजात की कुमाऊँ में परंपरा : इतिहास से 2000 तक का पुनरारंभ

वर्ष 2000 में नौटी (गढ़वाल) की राजजात समिति के निमंत्रण पर कुमाऊँ से पुनः सहभागिता का निर्णय लिया गया। इसके लिए एक पृथक आयोजन समिति गठित हुई, जिसमें—

  • अध्यक्ष: नारायण सिंह भाकुनी
  • महासचिव: कौशल किशोर सक्सेना
  • यात्रा प्रभारी: बालम सिंह जनोटी
  • मार्ग व्यवस्था: अमर सिंह बिष्ट
  • संगठन: डॉ. निर्मल जोशी
  • प्रचार: शिरीष पांडे
  • जनसंपर्क: दिनेश गोयल, किशन गुरूरानी
  • यात्रा में छत्र वाहकों में प्रभात साह गंगोला, विजय जोशी, भुवन जोशी, गिरीश चंद्र गुरंग, हरीश भंडारी, अनूप साह, जयमित्र बिष्ट और ललित साह शामिल थे।
  • विभिन्न समितियों में सर्व श्री गोविंद कुंजवाल, विधायक रघुनाथ सिंह चौहान , ब्लाक प्रमुख अमर सिंह बिष्ट ,बंसीधर मुनगली, मंदिर कमेटी के अध्यक्ष् इन्द्रलाल साह, बृज राज साह, पूर्व एसएसबी कमांन्डेट पी पाटनी, हरीश, अग्रवाल, मनोज वर्मा, कैलाश पांडे, प्रकाश पांडे, नवीन पंत, बंसी लाल कक्कड़, ओमी वोहरा, सुभाष अग्रवाल आदि ने दायित्व संभाले। चिकित्सा एवं स्वाथ्य परीक्षण सुविधा प्रदान करने के लिए के लिए डा जेसी दुर्गापाल एवं डा ललित वर्मा को अधिकृत किया गया। राजपरिवार से राजजात समिति समन्वय का कार्य मनोज वर्मा, मुन्ना वर्मा एवं जीवननाथ वर्मा ने संभाला।
  • क्षेत्र प्रमुख अमर सिंह, बंसीधर मुनगली, धरमसिंह मेहरा ने अपने अपने विकास क्षेत्रों में ग्रामीणों की बैठके कर राजजात में सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया। प्रदेश सरकार के मंत्री नारायण राम दास राजजात में सर्वाधिक सक्रिय रहे। जिला पंचायत बागेश्वर के अध्यक्ष बलवंत सिंह भौर्याल ने गरूड़ में राजजात की वृहत बैठक करवा कर सरकारी अधिकारियो को राजजात में सक्रिय सहयोग करने के निर्देश दिये।
  • आयोजन समिति के आग्रह पर गायत्रीकुंज हरिद्वार के सदस्य इस यात्रा में विशेष रूप से भाग लेने अल्मोड़ा पहुंचे।
  • राजजात की छंतोली के लिए निंगाल बिन्सर से मंगाये गये। छंतोली का विशिष्ठ अलंकरण एवं सज्जा का काम प्रभात साह गंगोला एवं छत्रवाहकों की टीम ने संभाला।
  • अल्मोड़ा से प्रारम्भ होने वाली यात्रा के लिए कोसी में गोकुल मेहता, मनान में मथुरादत्त पांडे, सोमेश्वर में एडवोकेट भूपेन्द्र जोशी, कौसानी में श्रीमती देवकी मेहरा एवं पानसिंह दोसाद, गरूड़ में ललित फर्सवाण, हरीश जोशी को प्रबन्ध व्यवस्था एवं आयोजन को भव्य एवं स्मरणीय बनाने की जिम्मेदारी दी गई। वाहनों को तकनीकी सहायता पहुंचाने के लिए किशन पांडे को जिम्मेदारी दी गई।
  • तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री बचीसिंह रावत, सांसद हरीश रावत जैसे कई गणमान्य भी यात्रा में स्थान- स्थान पर सम्मिलित हुए।
  • छंतोली एवं उसे ले जाने वाली टीम का रात्री विश्राम सोमेश्वर के पास माला गांव में तथा यात्रियों का कौसानी में किया गया। श्री गोविन्द कुंजवाल की ओर से कौसानी में यात्रियों के लिए रात्री विश्राम तथा भोजन एवं जगमोहन अग्रवाल की ओर से होटल सागर में सभी यात्रियों की रात्री विश्राम व्यवस्था एवं भोजन इत्यादि की व्यवस्था की गई। कौसानी होटल ऐसोसिएशन की ओर से अनेक होटलों में आवास प्रदान किये गये।
  • अत्यंत सक्रिय जिला प्रशासन से राजजात समिति एवं प्रशासनिक अधिकारियों के समन्वय का कार्य जिलाधिकारी टी व्यंकटेश एवं जन सुरक्षा एवं यातायात सुरक्षा का कार्य पुलिस अधिकक्षक गौतम ने स्वंय ही संभाला।
  • राजजात के कठिन मार्ग पर चलने हेतु प्रशिक्षण के लिए स्लाइड शो एसएसबी द्वारा नंदा गीता भवन में आयोजित किये गये जिसमें एसएसबी ग्वालदम की ओर से राजीव साह एवं बसंत बल्लभ भट्ट को भेजा गया। एस एस बी की एक पूरी टीम बचाव दल के रूप में पूरी यात्रा में शामिल रही।
  • अल्मोड़ा से नंद केसरी तक लगभग एक सौ वाहनों ने यात्रा में भागेदारी की ।
  • दैनिक अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित समाचार ने इस अवसर पर की कुमाऊँ में राजजात विषय पर लगातार तीन दिन विशिष्ठ परिशिष्ठ प्रकाशित किये।

महिला सहभागिता के लिए रीता दुर्गापाल, गीता उपाध्याय ,चन्द्रा अग्रवालऔर अन्य महिलाएं सक्रिय रहीं। तीन माह पूर्व से ही लगातार बैठकें होती रहीं और अल्मोड़ा से ग्वालदम तक यात्रा मार्ग व पड़ाव तय किए गए।

कौशल सक्सेना

यात्रा मार्ग और कार्यक्रम

यात्रा का कुमाऊँ मार्ग इस प्रकार रखा गया:
अल्मोड़ा नंदादेवी मंदिर → त्रिपुरा सुंदरी → पांडेखोला → कोसी → सोमेश्वर→ गरुड़ → ग्वालदम → नंदकेसरी (यहाँ गढ़वाल की यात्रा से संगम)। नगर भ्रमण के बाद प्रथम रात्रि पड़ाव विश्राम छंतोली का भगवती त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर अल्मोड़ा में हुआ।
रास्ते में माला और कोट भ्रामरी मंदिर में रात्रि पड़ाव हुए।

25 अगस्त 2000 को महामंडलेश्वर परेश यति के प्रवचन से कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
26–28 अगस्त को गायत्री परिवार द्वारा पंचकुंडीय यज्ञ, सांस्कृतिक संध्याएं और वरिष्ठ रंगकर्मी एवं लोक कला मर्मज्ञ बृजेन्द्र लाल साह द्वारा रचित नंदा चालीसा का पाठ हुआ।
27 अगस्त को छत्र  शोभायात्रा नंदादेवी मंदिर से त्रिपुरा सुंदरी मंदिर तक निकाली गई। देवी छत्र के नगर भ्रमण कार्यक्रम में स्थानीय मंदिरों से भव्य आरती उतारी गई। जिला पुलिस की ओर से स्थानीय कोतवाली पर प्रभारी निरीक्षक अरविंद डंगवाल ने छंतोली में भेंट बांध कर देवी को विदाई दी।
29 अगस्त को त्रिपुरा सुंदरी से राजजात का औपचारिक प्रस्थान हुआ।अष्टमी को नंदादेवी मंदिर अल्मोड़ा में आयोजित महाआरती में अनेक संस्थाओं द्वारा अपने अपने मोहल्लों से आरती लाकर पारंम्परिक परिधानों मे भागीदारी की गई।

नंदादेवी मंदिर अल्मोड़ा में अनेक संस्थाओं -पंजाबी महासभा ,जोहार समिति, श्री लक्ष्मी भंडार अल्मोड़ा द्वारा महाआरती में अपने अपने मोहल्लों से पारंम्परिक परिधानों मे भागीदारी की गई। स्व प्रेम मटियानी निदेशक गीत एवं नाट्य प्रभाग की ओर से सक्रिय भागीदारी की गई एवं विभागीय टीमों को भी भेजा गया।

सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम

यात्रा मार्ग में जगह-जगह पुष्पवर्षा, आरती और भंडारे की व्यवस्था रही। कोट भ्रामरी मंदिर में ऐतिहासिक कटार और अल्मोड़ा से आई नंदा प्रतिमा का मिलन हुआ। रात्रि में झोड़े–भगनौल के कार्यक्रम और पश्वाओं पर देवी अवतरण की रस्में हुईं। स्यालीधार और नंदावन में वृक्षारोपण कर इसे पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा गया।

ग्वालदम में एसएसबी और स्थानीय समाज ने भव्य स्वागत किया। नंदकेसरी में गढ़वाल और कुमाऊँ यात्राओं का संगम हुआ, जहाँ कांसुआ के कुँवर बलवंत सिंह और अल्मोड़ा के के.सी. सिंह बाबा ने अपनी -अपनी पगड़ी बदल कर संकल्प लिया कि आगामी राजजात में वे यहीं मिलेंगे।

गढ़वाल चरण

गढ़वाल में यात्रा नौटी से आरंभ होकर 16 पड़ावों के बाद होमकुंड पहुँची। नंदकेसरी इस वर्ष नया पड़ाव था। लगभग 50,000 यात्री शामिल हुए, जिनमें 10–15 हजार होमकुंड तक पहुँचे। पुरानी परंपरा के विपरीत कई महिलाएं भी पातरनचौणियां से आगे होमकुंड तक गईं।

पुरानी नंदा राजजात (1925 तक) तथा 2000 की पुनः प्रारंभ यात्रा – अंतर

सहभागिता: पुरानी यात्रा: कुमाऊँ से सहभागिता राजा बाज बहादुर चंद के समय से थी, अंतिम बार 1925 में हुई। 2000 की यात्रा: नौटी समिति के निमंत्रण पर 75 साल बाद कुमाऊँ की फिर से भागीदारी हुई। नेतृत्व :पुरानी नेतृत्व : राजपरिवार और स्थानीय प्रतिनिधियों के पास था। नई: राजा के सी सिंह बाबा की अगुवाई और , नंदादेवी राजजात समिति और नंदादेवी मंदिर समिति के पदाधिकारी नेतृत्व में रहे।धरोहरें:पुरानी: कोट मंदिर की कटार, राजछत्र और नंदा प्रतिमा साथ होती थी। नई: वही परंपरा जारी रही, साथ में स्वर्ण प्रतिमा और विशेष छंतोली भी शामिल हुई। यात्रा मार्ग:पुरानी: नंदकेसरी में गढ़वाल की मुख्य यात्रा से मिलन होता था।नई: विस्तृत मार्ग – अल्मोड़ा → त्रिपुरा सुंदरी → कोसी → गरुड़ → ग्वालदम → नंदकेसरी → नौटी → होमकुंड; ठहराव – माला गांव (कौसानी), कोटभ्रामरी मंदिर। सांस्कृतिक कार्यक्रम:पुरानी -धार्मिक पूजन और लोकनृत्य होते थे। नई: धार्मिक पूजन -सांस्कृतिक संध्याएं, नंदा चालीसा, झोड़े-भगनौल, जागर, वृक्षारोपण आदि। महिला भागीदारी:पुरानी: महिलाओं की भागीदारी सीमित थी और आगे के पड़ावों में और कम हो जाती थी। नई: पातरनचौणियां से होमकुंड तक बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। श्रद्धालु संख्या: पुरानी: कुछ हजार श्रद्धालु आते थे। नई: लगभग 50,000 श्रद्धालु आए, जिनमें 10–15 हजार होमकुंड तक पहुँचे। विशेष आयोजन:पुरानी: देवी अवतरण और पश्वा अनुष्ठान होते थे। नई: आधुनिक प्रबंधन, सुरक्षा बल का सहयोग और पर्यावरण संदेश भी जोड़े गए।

कुमाऊँ में इस यात्रा की एक विशेषता यह भी रही की विशाल जनसहभागिता वाली यह विराट यात्रा शासन -प्रशासन के किसी भी प्रकार के आर्थिक सहयोग के बिना जनसहयोग से सम्पन्न् हुई।

हरीश जोशी

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