अल्मोड़ा हिमालय की गोद में बसा एक सुरम्य नगर है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। लेकिन इस सुन्दर नगर में छिपे हुए अनेक खूबसूरत बंगले हैं जो औपनिवेशिक युग की याद दिलाते हैं जब अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया था। अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के साथ ये बंगले अतीत की झलक पेश करते हैं और इतिहास का स्वाद लेने के लिए एक अनूठा आवास अनुभव प्रदान करते हैं।

अल्मोड़ा विजित करने के बाद अंग्रेजों की सबसे बड़ी जरूरत अपने सैनिक और प्रशासनिक अधिकारियों के आवास के लिए ब्रिटिश शैली के भवनों का निर्माण रहा जिन्हें उन्होने स्थानीय शैली के सम्मिश्रण से और अधिक भव्य और स्थानीय जलवायु के अनूकूल बनाने की कोशिश की। वर्ष 1815 के बाद अंग्रेजों ने अल्मोड़ा को आवास के रूप में चुना, तब उन्होंने यहाँ एक विशिष्ट वास्तुकला को जन्म दिया। ब्रिटिश युग के बंगले भारतीय और ब्रिटिश स्थापत्य शैली का सामंजस्यपूर्ण मिश्रण हैं जो मुख्य रूप से 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए और ब्रिटिश अधिकारियों के निवास के रूप में प्रयोग किये गये थे। उन्हें क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल विशाल, आरामदायक और स्वास्थ के लिये अनूकूल हवा -धूप प्राप्त करने के लिए के लिए डिजाइन किया गया था। बंगलों के चारों ओर फैली हरियाली तथा प्रकृति के साथ जीवन ही इन बंगलों के स्थापत्य का मूल मंत्र था।
ऐसी कई इमारतें हैं जो भव्यता के साथ ब्रिटिश काल के स्थापत्य की जीवंत कथाएँ कहती हैं। इनमें सेंट माकर्स बंगला जो अब टैगोर हाउस के नाम से जाना जाता है तथा इसमें वर्तमान में छावनी परिषद अल्मोड़ा का कार्यालय है, प्रसिद्ध है। अल्मोड़ा का सर्किट हाउस भी भव्य इमारत है जिसमें कभी हेनरी रैमजे का आवास था। यह शानदार बंगला कुमाऊँ के सबसे लोकप्रिय कमिश्नर सर हेनरी रैमसे का आधिकारिक निवास हुआ करता था। रैमसे ने इस आलीशान परिसर में 1883 तक निवास किया और यहीं से कुमाऊँ के कई बड़े प्रशासनिक फैसले लिए गए।ओकले हाउस, जिसमें होली हिमालय के लेखक पादरी ओकले रहते थे तथा जिसे अब भगनी निवेदिता काटेज के नाम से जाना जाता है , पहले अंटा हाउस के नाम से जाना जाता था। यह अपने समय की प्रसिद्ध इमारत थी। यही नहीं थाम्पसन हाउस में कभी स्वामी विवेकानंद के निर्देश पर प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन हुआ था तथा जहां स्वामी जी अपने शिष्यों के साथ अल्मोड़ा प्रवास के दौरान वर्ष 1898 में रूके थे। इसी भवन में नोबल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक रोनाल्ड रास का जन्म भी हुआ था। विवेकानंद कृषि अनुसंधानशाला के संस्थापक प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक बोसी सेन का आवास कुंदन हाउस भी अत्यंत भव्य ,संतुलित और विशाल है। मल्ली बाजार स्थित डिग्गी बंगला भी प्रसिद्ध भवन है। चिलकपिटा बंगला, जिसके स्थान पर अब होटल मैनेजमेंट का भवन है, भी एक भव्य और सुन्दर इमारत रही थी। यह सभी भवन एंग्लो-इंडियन आर्किटेक्चर के अल्मोड़ा में सुंदर प्रतीक हैं। नगर के उत्तर की ओर भी कई प्रसिद्ध बंगले बनाये गये जो प्रमुख रूप से रानीधारा, रानीधारा टॅाप तथा हीराडूंगरी आदि मोहल्लों में थे।
इन सुन्दर भवनों की ऊँची छतें कमरों को हवादार रखती हैं, और बड़े कांच की दो पटों वाली खिड़कियां, सामान्य रूप से बनाई जाती थीं, ताकि सर्दियों की धूप का अधिकतम लाभ उठाया जा सके।

इन बंगलों में देवदार, साल, तुन आदि की की लकड़ी, चूना पत्थर और टिन की चादर का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया गया है। देवदार की लकड़ी न केवल मजबूती देती है, लम्बे समय तक खराब नहीं होती तथा इसकी प्राकृतिक सुगंध कमरों को ताजगी से भरे रखती है। परम्परागत पहाड़ी शैली के मकानों में बनी अंगीठी-रौन की तरह ही हर कमरे में पत्थर की अंगीठी इन बंगलों की पहचान है, जो ठंडी रातों में एक सुखद एहसास कराती है।
अधिकांश बंगलों की छतें बनाने में इंगलैड से मंगाई गई नालीदार टिन की चादर अथवा सुन्दरता से कटी हुई स्लेटों का प्रयोग किया गया है। टिन की चादर शिमला, मसूरी, दार्जिलिंग और ऊटी जैसे हिल स्टेशनों पर ब्रिटिश अधिकारियों के बंगलों, चर्चों और बैरकों की छतों के लिए यह सबसे पसंदीदा सामग्री बन गई, क्योंकि यह हल्की थीं और इन्हें पहाड़ों पर ले जाना आसान था। साथ ही, ढलवां छतों पर इनसे बर्फ और पानी आसानी से फिसल जाते थे।जिनके नीचे गर्मी की तपिश से बचाने के लिए लकड़ी के तख्त और बल्लियों का प्रयोग किया गया था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने सैन्य और प्रशासनिक भवनों के लिए 1840 और 1850 के दशक के दौरान इसका आयात करना शुरू किया था।
बंगलों के सामने भव्य और विशाल बारामदा और बागान बनाए गए हैं। खुला बारामदा जो प्रायः पत्थरों को काट कर बनाये गये स्तम्भों पर आधारित होता था, में बैठकर गुनगनाती धूप का आनंद लिया जा सकता था तथा मिलने आने वाले आगुन्तकों के लिए प्रतीक्षा स्थल का भी काम करता था। चारों ओर फैली हरियाली हर बंगले की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। पोर्टिको के रूप में काफी बड़ा स्थान छोड़ा जाता था।
अधिकांश बंगले एक मंजिल के थे, लेकिन भव्य और सुंदर बनाए गए थे। यही नहीं, इसी विधा और स्टाइल का पालन पर्वतीय क्षेत्र के वन विभाग के अधिकांश विश्राम गृहों के निर्माण में भी किया गया ।

जैसे-जैसे समय बदला, यहाँ के समृद्ध स्थानीय व्यवसायियों ने कई ब्रिटिश बंगलों को खरीद लिया। इसके बाद इन बंगलों की बनावट में आंशिक रूप से पारंपरिक कुमाऊँनी शैली का भी समावेश होने लगा।
अल्मोड़ा के ये बंगले केवल पत्थर और लकड़ी के ढांचे नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय कारीगरी और ब्रिटिश डिजाइन का एक शानदार संतुलन हैं। इन बंगलों के निर्माण के साथ ही अल्मोड़ा में भवन निर्माण की नई शैली भी विकसित हुई जिसपर ब्रिटिश प्रभाव और तकनीकी को स्पष्ट देखा जा सकता है तथा ये पूर्ववर्ती पहाड़ी शैली के भवनों से पूर्णतः भिन्न् थी।






