लेखक: कौशल किशोर सक्सेना-नवीन बिष्ट

होली की बैठकें खोजती हैं तारी मास्साब को

तारी मास्साब की अब केवल याद रह गई है। दो बरस ही हुए हैं तारी मास्साब को। वे होलियारों को होली गायकी से सराबोर कर देते थे। माधुर्य लोच और तरंगिन का मिला हुआ रूप था उनकी गायकी। इस बरस कहीं खो गया है वह स्वर। होली की...