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वर्षा के देवता के स्वागत में एक मेला

पिथौरागढ़ जनपद मुख्यालय के चर्तुदिक् फैले ग्रामीण क्षेत्रों में तीन प्रसिद्ध मेलों का प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है। भाद्रपद की गणेश चतुर्थी को खान नामक पहाड़ की चोटी पर देवी मेला लगता है। इसके दूसरे दिन हरियाली तृतीया को किरात वेश में रहने वाले भूमि के स्वामी केदार नाम से पूजित शिव के मंदिर स्थल केदार में मेला लगता है। बल केदार जनपद मुख्यालय से 77 किमी. दक्षिण पूर्व में नौ हजार फुट की ऊँचाई पर स्थित है। तीसरे दिन ऋषि पंचमी को पिथौरागढ़ से 6 किमी. की दूरी पर लगभग छः हजार फुट की ऊँचाई पर इस जिले का प्रसिद्ध और दर्शनीय मेला सम्पन्न होता है। यह मेला मोस्टामाणू का मेला कहलाता है।

ब्रजेन्द्र लुंठी

मोष्टामाणू का मंदिर पिथौरागढ़ नगर के पास पश्चिम-उत्तर दिशा में एक ऊँची चोटी पर स्थित है। मोस्टामाणू शब्द का अर्थ है– मोस्टा देवता का मंदिर। लोक जगत में विश्वास है कि मोस्टा देवता जल वृष्टि करते हैं। वे इन्द्र के पुत्र हैं। मोस्टा की माता का नाम कालिका है। वे भूलोक में मोस्टा देवता के ही साथ निवास करती हैं। इन्द्र ने पृथ्वी लोक में उसे भोग प्राप्त करने हेतु अपना उत्तराधिकारी बनाया। दंत कथाओं में कहा जाता है कि इस देवता के साथ चौसठ योगिनी, बावन वीर, आठ सहस्त्र मशान रहते हैं। ‘चुटनी बयाल’ नामक आंधी तूफान उसके बस में है। मोष्टा देवता के रुष्ट हो जाने पर वे सर्वनाश कर देते हैं। वह बाइस प्रकार के वज्रों से सज्जित है। माता कालिका और भाई असुर देवता के सहयोग से वह नाना प्रकार के असंभव कार्यों को संपादित करता है। मोष्टा और असुर दोनों के सामने बलिदान नहीं होता परन्तु उनके सेवकों के लिए भैंसे और बकरे का बलिदान किया जाता है।

मोष्टा को नागदेवता माना जाता है। उनकी आकृति मोष्टा या निंगाल की चटाई की तरह मानी गयी है। उन्हें विषों से युक्त नाग माना जाता है। इसलिए जो लोग नागपंचमी को नागदेवता की पूजा नहीं कर पाते वे मेले के दिन यहाँ आकर उनका पूजन सम्पन्न कर लेते हैं।

मेले के अवसर पर मोष्टा देवता का रथ निकलता है। इसे जमान कहते हैं। लोग इसके दर्शन के लिये दूर-दूर से आते हैं।

ब्रजेन्द्र लुंठी

इस मेले का व्यापारिक स्वरूप भी है। स्थानीय फल फूल के अतिरिक्त रिगाल की टकरियां, चटाइयां, कृषियंत्रों, काष्ठ बर्तनों तथा तरह-तरह की वस्तुओं की खरीद फरोख्त होती है।

मेले के अवसर पर लोक गायक और नर्तक भी पहुंचते हैं। हुड़के की थाप पर नृत्यों की महफिलें सजती हैं; गायन होता है। शाम होते-होते मेले का समापन होता है। वर्तमान में सरकारी विभाग भी अपने-अपने कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करने के लिए मेले का उपयोग करते हैं।

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