
तारी मास्साब की अब केवल याद रह गई है। दो बरस ही हुए हैं तारी मास्साब को। वे होलियारों को होली गायकी से सराबोर कर देते थे। माधुर्य लोच और तरंगिन का मिला हुआ रूप था उनकी गायकी। इस बरस कहीं खो गया है वह स्वर।
होली की बैठकों की शुरुआत होते ही एक खालीपन कचोट रहा है। उनकी गुम हो गई धुनों की याद इन बैठकों को और बोझिल कर रही है।
तारी मास्साब के नाम से जाने जाने वाले स्व. तारा प्रसाद पांडे की होली गायकी की अपनी विशेषता थी। लगता था जैसे छोटा ख्याल या ठुमरी गा रहे हैं। उनका कहना था कि स्वरों की अनभिज्ञता से रागों का स्वरूप विकृत होता जा रहा है। ताल, लय, स्वर की जो पकड़ पंडित जी में थी, उनकी पीढ़ी के होली गायकों में कम ही मिलती है। राग काफी में उनकी गायकी ‘सबको मुबारक होली’ के मधु मिश्रित बोल आज भी गूंजते रहते हैं।
उनकी गायकी का आधार स्वर गांधार माना जाता है। जिस बैठक में मास्साब जाते, उसको रोशन कर देते। उनके बैठक से उठते ही महफिल की रंगत ही उड़ जाती।
यूं तो पूरा अल्मोड़ा होली की विरासत लिए है। यहां के हर गली-मोहल्ले में घर-घर पूस माह के प्रथम रविवार से होली की बैठकें शुरू हो जाती हैं। वे लगभग १०-१५ सालों से हेमंत वैद्य के निवास पर होली की शुरुआत करते थे और गुंजायमान करते थे। उनके साथ तबला वादक संगत करते नहीं अघाते थे। मास्साब का संगीत पक्ष भी बेहद पुख्ता था। हारमोनियम के साथ-साथ वे तबला, सितार, बांसुरी के भी अच्छे ज्ञाता थे। वे हर राग की होली उसके धम्मार से ही शुरू करते थे। स्व. पांडे जी के साथी कहते हैं कि मास्साब का भैरवी गायन विशेष प्रभावित करने वाला होता था। लोग उन्हें इतना सम्मान देते थे कि बैठकों में उन्हें अक्सर एकल ही सुनते थे।
शास्त्रीयता की ओर ज्यादा झुकाव होने से हर गायक मास्साब की होली को उठाने का साहस ही नहीं करता। स्व. पांडे जी बरसों से राजकीय कॉलेज अल्मोड़ा में अध्यापन से जुड़े रहे हैं। उन्होंने अवकाश भी जिले के खूंट इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य पद से ही लिया था। परिवार वाले बताते हैं कि जब वे सात बरस के थे तभी से उन्होंने रियाज़ शुरू कर दिया था। उन्होंने भातखंडे संगीत महाविद्यालय से विशारद की डिग्री ली। सुबह साढ़े पांच बजे से दो घंटे रियाज करना उनका दैनिक नियम था। उन्होंने संगीत को ही जीवन का हिस्सा बना लिया था और आखिरी लम्हे तक उससे जुड़े रहे।
तारी मास्साब उन गायकों में से थे जिन्होंने कभी प्रसिद्धि की ओर ध्यान नहीं दिया। उनके पास कई ऐसे प्रस्ताव आए, जब वे चाहते तो राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो सकते थे, लेकिन वे अपने कुमाऊं से बाहर बसने की कल्पना भी नहीं करते। मोहन उप्रेती सरीखे लोगों ने उनसे न जाने कितनी बार दिल्ली चलकर बसने के लिए कहा, लेकिन हर बार उन्होंने विनम्रता से इनकार कर दिया। कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद जैसे शहरों से उनके पास होली शुरू होते ही निमंत्रण आते हैं। वे गए भी, लेकिन बसने के लिहाज से नहीं।
बहुत कम लोगों को मालूम है कि उन्होंने कुमाऊंनी होली की सरगम भी तैयार की थी। ये वे होली गीत थे जो लोक धुनों पर आधारित थे। लेकिन वे उन्हें प्रकाशित नहीं कर सके। उनके कुमाऊंनी होली गीतों का एक कैसेट भी बाजार में आया था। उनके शिष्यों में कुछ विदेशी भी हैं।
अल्मोड़ा में होली की बैठकों की परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन तारा प्रसाद पांडे ने उसे शास्त्रीयता का पुट देकर जैसे एक नई शैली ही विकसित कर दी। कहा जाता है कि ज्यों-ज्यों सुबह आती जाती, मास्साब का स्वर माधुर्य और होता जाता। सुबह की किरणें जब फूटतीं तो उनका स्वर ही रात के स्वर से जैसे बिल्कुल अलग होता। स्वर के इस निखार को वे स्वर साधना का परिणाम मानते थे।
लेकिन सरकारी नौकरी से अवकाश लेने के बाद वे स्वतंत्र होकर संगीत साधना करना चाहते थे, लेकिन ईश्वर को यह मंजूर नहीं हुआ। वे वायरल इंफेक्शन की चपेट में आकर कुछ समय बीमार रहे और इसी बीमारी से ७ अक्टूबर १९८७ को उनका निधन हो गया।
तारा प्रसाद पांडे के बड़े भाई पूरन चंद्र पांडे आज भी भरे दिल से होली गाने जाते हैं। इस बार भी होली आते ही होली की बैठकें जुड़ने लगी हैं। पूरन दा के नाम से जाने जाने वाले श्री पांडे कहते हैं कि इस बार भी मन नहीं बना है। न जाने कितनी महफिलों में हम दोनों भाइयों ने साथ गाया है। भाई के बिना होलियों की कल्पना ही नहीं कर पाता हूं।
