नन्दादेवी का मेला भाद्रमास की पंचमी से प्रारम्भ होता है जिसमें नन्दा एवं सुनन्दा की केले की वृक्षों से दो प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इस प्रतिमाओं का निर्माण करने के लिए नगर के ऐसे व्यक्तियों, जिनके बगीचों में केले के वृक्ष स्थित हैं से सम्पर्क स्थापित करके प्रतिमा निर्माण के लिए उनसे चार केले के पेड़ों की मांग की जाती है। जिस स्थल से केले के वृक्ष प्रतिमा निर्माण के लिए लाने होते हैं, वहां पर पुजारी मेला आयोजन समिति के लोगों के साथ पंचमी के दिन न्यौता (निमत्रण) देने जाते हैं।

पुजारी अपने साथ रोली (पिट्ठयां) चावल (अक्षत) , वस्त्र (लाल, सफेद) धूप बत्ती, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री ले जाता है। मंत्राच्चारण के बाद पुजारी द्वारा केले के पेड़ों पर अक्षत के दाने फेंके जाते हैं। अक्षत जिन चार वृक्षों में सबसे पहले लगते हैं उनको क्रमशःः एक,दो, तीन एवं चार क्रमों में चुन लिया जाता है। प्रथम क्रम में चयनित केले के वृक्ष से नन्दा एवं द्वितीय से सुनन्दा की प्रतिमायें बनाने की परम्परा चली आई है। यदि किसी कारण इन दोनों में से कोई एक अथवा दोनों केले के स्तम्भ थोड़े से भी खंडित अवस्था में मिलें तो इनके स्थान पर तीसरे और चौथा स्तम्भ से प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता है। वृक्षों का चयन हो जाने के बाद इनकी पूजा, आरती कर इन पर वस्त्र बांध दिये जाते हैं।
सप्तमी तिथि को ब्रह्म मुहूर्त में इन स्तम्भों को लाने के लिए, नन्दादेवी के प्रांगण से यात्रा प्रारम्भ होती है। इस यात्रा में लाल निषाण (ध्वज) सबसे आगे रहता है। आज भी कुमाऊॅं में शादी के समय वर के विवाह करने के लिए जाते समय यही ध्वज आगे रहता है। इसके पीछे नन्दादेवी की महिमा का वर्णन करते हुवे ‘जगरिये’ परम्परागत वाद्ययंत्र, छोलिया, जनसमूह एवं अन्त में सफेद ध्वज रहता है। यह यात्रा निमंत्रित वृक्षों के स्थान तक जाती है। वहां केले के वृक्षों को चयन क्रमानुसार जड़ के कुछ ऊपर से काट लिया जाता है। इन चारों वृक्षों के शेष भागों का पूजन आरती करके नारियल तोड़कर यात्रा वापस लौटती है।

वापसी में सफेद निषाण (ध्वज) आगे एवं लाल ध्वज अन्त में रहता है। यह परम्परा विवाह करके बारात की वापसी के समय आज भी इस अंचल में प्रचलित है। सफेद ध्वज के बाद क्रम से चारों केले के स्तम्भ रहते हैं शेष क्रम पूर्ववत रखते हुवे यह यात्रा ड्योढ़ी पोखर पहुंचती है। ड्योढ़ी पोखर (वर्तमान में राजा आनन्द सिंह राजकीय कन्या इन्टर कालेज) के मन्दिर से इन केले के स्तम्भों की पूजा, आरती की जाती है। फिर बंसल गली के रास्ते, लालाबाजार होकर नन्दादेवी के प्रांगण में केले के स्तम्भों को खड़ा कर दिया जाता है।
सप्तमी के दिन ही पूजा के बाद अपराहृ में प्रतिमा निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जाता है और उसी दिन रात्रि दस ग्यारह बजे तक निर्माण पूर्ण हो जाता है। केले के स्तम्भों के अतिरिक्त निम्न सामग्री प्रतिमा निर्माण हेतु प्रयोग में लाई जाती है।
बेंत की लकड़ी ः इसका प्रयोग ढांचा बनाने के लिए किया जाता है।

बांस की लकड़ी : इसको काटकर इसके टुकड़ो को एक ओर से नोकदार बना कर कीलों जैसा आकार दे दिया जाता है ये केले की छाल को केले के स्तम्भ के जोड़ने के काम आती है।
सूत्री वस्त्र : लगभग 5 मीटर सूती कपड़ा (पीले/गुलाबी) रंग का इसमें पहले पीले कपड़े का प्रचलन था क्योंकि पीत वस्त्र देवताओं के वस्त्रों में प्रमुख है किन्तु अब कुछ वर्षों से गुलाबी रंग का कपड़ा प्रयुक्त किया जाने लगा है। इससे प्रतिमा के ढांचे का बाहरी आवरण बनाया जाता है।
पाग : सफेद कपड़े की लगभग 6 अंगुल चौडी, आधा मीटर लम्बी पट्टी पाग कहलाती है। यह प्रतिमा के सिर पर गोल बांधी जाती है।
लाल रंग ः शुभ का प्रतीक लाल रंग के लिए पिट्ठयां (रोली)
जो हल्दी इंगूर आदि को पीसकर बनाई जाती है का प्रयोग होता है।
सफेद रंग ः शांति के प्रतीक इस रंग के लिए बिस्वार (चावल
को भिगाकर पीसकर जो पिस्टी बनती है) का प्रयोग किया जाता है। बिस्वार से ही पर्वतीय अंचल के त्यौहारों, मांगलिक कार्यों में ऐपण (अल्पना) भी बनाये जाते है।

पीला रंग इसके लिए कुमकुम का प्रयोग होता है।
काला रंग ः इसके लिए काले रंग का प्रयोग होता है।
इन रंगों के स्थान पर अब बाजार के रंगों का भी प्रयोग किया जाने लगा है।
चांदी की आंखें: प्रतिमा के लिए चार चांदी की बनाई आंखो का प्रयोग किया जाता है इन्हें जिन्हें प्रति वर्ष विसर्जन के समय प्रतिमाओं से निकाल लिया जाता है तथा अगले वर्ष यही आंखें फिर से काम में लाई जाती है।
पाती ः यह एक वनस्पति है जो स्वाद में तीती (कड़वी) होती है ये देव पूजन के काम में लाई जाती है। इसकी टहनियों को जोड़कर हाथ बनाये जाते है तथा इसी को चारे के समान काटकर प्रतिमाओं को बैठाने के लिए आसन भी तैयार किया जाता है। यही प्रसाद के काम में आती है।
इनके अतिरिक्त सुई, धागा, ब्रुश, पहनाने के कपड़े, इत्यादि सामग्री प्रयोग में लायी जाती है।
केले के स्तम्भों से निर्मित प्रतिमाओं की कलाकारी में इस क्षेत्र की विशिष्टता है। इसमें कदली (केले) के स्तम्भों के द्वारा ही प्रतिमाओं को विशेष स्वरूप दिया जाता है। यह स्वरूप लगभग नन्दादेवी पर्वत के स्वरूप के समान ही है। जो केले के स्तम्भों के आधार के ऊपर कपड़ा कस दिये जाने पर पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है। फिर कपड़े पर रंगों से देवी की आभा को पूर्ण विकसित कर दिया जाता है।

प्रतिमा निर्माण में एक विेशेष बात खोड़िया (स्वास्तिक का चिन्ह), सूर्य तथा चन्द्रमा के प्रतीक चिन्ह निर्मित किया जाना भी है। ये ब्रह्याण्ड और प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं तथा इस क्षेत्र में मांगलिक कार्यों में भी ये प्रतीक निर्मित किये जाते रहे हैं।
अष्टमी के दिन प्रातःकाल से ही बड़ी संख्या में महिलाऐं इस अंचल के मांगलिक वस्त्रों को पहन कर प्रतिमाओं की पूजा, अर्चना के लिए आती हैं। यह क्रम अपराह्न तक चलता है। इसी दिन रात्रि में मुख्य पूजा होती है।
इन मूर्तियों की पूजा में दो विशिष्ट प्रकार की चौकियाँ (ऐपण) बनती हैं, एक चैकी में सप्तमी की रात्रि प्रतिमाओं के पूर्ण बन जाने के उपरान्त इसके ऊपर पाती (घास) बिछाकर प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है और दूसरी चौकीअष्टमी की रात्रि की मुख्य पूजा के लिये बनाई जाती है।
प्रतिमा निर्माण में परम्परागत कुमाऊंॅंनी संस्कृति की झलक मिलती है। प्रतिमाओं का परम्परागत परिधान घाघरा, आंगड़ा, (ब्लाउज) एवं धोती का पिछौड़ा पहनाया जाता है इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में प्रचलित फेटा (पाग) भी प्रतिमाओं मूें उसी प्रकार पहनाई जाती है जैसे इस अंचल की ग्रामीण महिलाऐं पहना करती हैं तथा प्रतिमाओं में जो पिट्ठयां लगाया जाता है वह नाक के ऊपर से लगाया जाता है जैसा इस क्षेत्र की ग्रामीण महिलाऐं आज भी लगाया करती है।
इस प्रकार नन्दा देवी की प्रतिमा निर्माण कला इस क्षेत्र की परम्परागत लोक कला, तांत्रिक उपासना पद्धति एवं संस्कृति को अक्षुण्य बनाये रखने का महत्वपूर्ण कार्य करती चली आ रही है।
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श्री प्रमोद बिष्ट का यह लेख नंदादेवी सन्दर्भ पत्रिका वर्ष 1988 (सम्पादक पी सी जोशी-डा0 निर्मल जोशी, प्रकाशक- कौशल किशोर सक्सेना ) से साभार लिया गया है।



