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उत्तरांचल के लोकगीतों में नन्दा

अल्मोड़ा में ग्रीष्म की पीली उदास धुंधलाई सन्ध्या की इस वेला में……..मैं एकाकी बैठा कसार देवी के शिखर पर….और देख रहा हूं सुदूर हिमाच्छादित नन्दादेवी के शिखर को! थके मांदे सूरज की अस्तमुखी किरणें कुहासे में डूबे धूमिल शिखरों को सहला सी रही हैं। अतीत की स्मृतियों से उभरते हुए नन्दा शिखर को मैं हेर रहा हूं और धीरे-धीरे खोता जा रहा हूं….अतीत में सुने हुए उन भूले बिसरे गीतों में, जो उत्तराचल की इष्ट भवानी ‘‘नन्दा’’ को आधार मानकर गाए गए थे।

थ्रीश कपूर

वह सब गीत आज गाथाएं धुंधला गये हैं और आज की इस धूमिल संध्या में अस्तमुखी सूरज की तरह ‘‘पश्चिमी-शितिज’’ में डूबती जा रही हैं। और उन्हीं गीत-गाथाओं के साथ-साथ, धुॅंधलाई हुई नन्दादेवी के चारों ओर, छाये-कुहासे की तरह लिपटे हुए नन्दा-गीत भी अस्त हो रहे हैं!… अपनी स्मृति की गहराइयों में डुबकी लगाकर, उत्तरांचल में नन्दादेवी के हेतु गाए हुए कुछ लोक गीतों को मैं गाने-गुनगुनाने का प्रयत्न कर रहा हूूं। कसार देवी की चोटी पर बैठा हुआ नन्दा के धूमिल शिखर को छलकीली आखों से निहारता हुआ मैं… लोकगीतों को खोजने वाला एक थका हुआ बंजारा!
सुदूर दानपूुर और मुनस्यारी के क्षेत्र में सामूहिक आराधना के रूप थें गाई जाने वाली चांचरी के कुछ बोल मन में उभरने लगे हैं। अभावग्रस्त जीवन जीने वाले शैलांचल वासियों की आकांक्षा अतृप्ति और अभाव को पूरा करने वाला वह सांकेतिक ‘‘मासी का फूल’’ कभी उन लोगों को मिल जाए अथवा उसे वह संघर्षरत होकर प्राप्त कर लें तो उस मासी के फूल को वह कहां-कहां अर्पित करेंगे? इसका आभास मिलता हैं हमें लोक गीत के इन बोलों मेंः-
धैं को टिपी ल्यालो मासी को फूल।
जे जालो बुग्याल मासी को फूल।।
धैं वी टिपी ल्यालो मासी को फूल।
जो जालो हिंवग्ल मासी को फूल।।
धैं वी टिपी लयालो मासी को फूल।।
कै देबा चढ़लो मासी को फूल।।
थाती को थत्याल मासी को फूल।
ऊं नन्दाॅं हिंवाल मासी को फूल।
कोटै माई नन्दा मासी को फूल
वंी देवी चढा़लो मासी को फूल
वर दैणा है जाए मासी को फूल
सबों की तरफ मासी को फूल।।

जोहार की पारम्परिक ‘‘चांचरी’’ में इष्ट देवी नन्दा के जन्म और रूप का वर्णन उपमा और अलंकारों से सुसज्जित करके किया जाता हैः-
देवी को जनमण भेंछ
तू देवी किया रूप भैछ।
तू देवी गठ्यूली सरौलै
जाॅंणी धोबी कसी मुंगरी।
तू देवी जाङुगी सरौलै
जाॅंणी केला कसी रे खामा।
देवी को जनमण भैछ
तू देवी किया रूप भैछ।
देवी का जन्म हो जाता है, उसके अंग प्रत्यंगो की श्रोभा का वर्णन करने के उपरांत उसे स्थापित किया जाता है और उसकी आराधना की जाती है। अन्त में उसे विभिन्न प्रकार की सामग्री (केवल गीतों में) चढ़ाकर अभावग्रस्त शैलवासी वरदान की कामना करने लगते हैं।
त्वै देवी चढ़ौलो जऊंला निसाॅण
हिमाल की नन्दा देवी किया वर देली
त्वै देवी चढ़ौंला द्वी जौंल्या नाॅगरा
हिमाल की नन्दा देवी किया वर देली
त्वै देवी चढ़ौला द्वी जौंल्या मुंगरी
हिमाल की नन्दा देवी किया वर देली
निरपूती के देली देवी तू पूत को वर
निरधन्या कै देली देवी अन्न धन को वर
हिमाल की नन्दा माई सुफल है जाए
वरदैणा है जाए देवी हमारा ऊपर।।
नन्दादेवी की मात्र स्थापना करके ही पूजन नहीं होता वरन उसकी डोली भी निकाली जाती है और यह पर्व यदा कदा देखने में आता है गढ़वाल मण्डल में। वहां देवी की छोटी जात (शोभा यात्रा) और बड़़ी जात निकला करती है। गत वर्ष लगभग चौदह वर्ष के अन्तराल में ‘‘बड़ी-जात’’ निकली थी। हरे पीले वस़्त्रों तथा रंग-विरंगे फूलों से सजे हुए नन्दा देवी के छोटे बड़े डोले विभिन्न ग्रामों से जात में शामिल होने निकलते हैं साथ में निकलती है देवी की छतरियां।
नन्दा के डोले के आगमन पर गांव-गांव में स्वागत गीत गाए जाते हैं, इन्हें अधिकांश शैलांचल की ग्राभ्याएं ही गाती हैं। हरे-भरे घने जंगलों और मखमली बुग्यालों के गांवो में जब सजा हुआ डोला पहुॅंचता है तो वातावरण में स्वागत गीत के यह मधुर बोल छा जाते हैः-
हरिया पातल देवी कै को डोलो आए।
सेली रे बुग्याल देवी कै को डोलो आए।
रमकन्या ठमकन्या तेरो डोलो आए।
हरिया पाताल देवी तेरो डोलो आए।
क्या भलो लागदो देवी तेरो डोलो आए।
क्या भलो लागदो देवी तेरी छात आए।
ळरिया पातल देवी तेरो डोलो आए।
उसी नन्दादेवी से सुख समृद्धि का वर प्राप्त करने न केवल शैलांचल के राज परिवार ‘‘जात’’ लेकर जाते थे वरन सुदूर के राजे रजवाड़े भी अनकों मनौतियां लेकर ‘जात’ में शामिल होते थे। उन्हीं लोगों में एक बार (सम्भवतः दो तीन शताब्दी पूर्व) कन्नौज के राजा जसदेव भी गए थे और उनका पथ-प्रदर्शन किया था उरगम ग्राम के साहसिक पर्वतारोही ठाकुर धरमसिंह ने। कन्नौज का राज परिवार, अन्य यात्री और धर्मसिंह सहित उरगम गांव के श्रद्धालु लोग सम्भवतः वापस लौटते समय हिम-झंझावात के चपेटे में आ गए और उस दल पर हिमखण्डों का स्खलन हुआ और वह यात्रा-दल रूपकुण्ड की शीतल गहराइयों में सदा-सदा के लिए सो गया। आज भी रूपकुण्ड में पड़े कंकालों से पास बिखरे हुए सामान के अवषेशों के अध्ययन से हमें कन्नौजी सभ्यता की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है…. उस सामूहिक लोकगीत में, जिसे मैंने आज से तीस वर्ष पूर्व सन् 1958 में चमोली जिले के उरगम ग्राम के कतिपय जानकार बुजुर्गों ने गाया था। उस यात्रा-गीत के कुछ बोल आज भी मेरी स्मृति में कुछ इस प्रकार सुरक्षित हैः-
‘‘राजा जसीदेव हो… नन्दा जाती जांदो ऽऽऽ।
कुटुम्ब परिवार ल्हिके नन्दा जाती जांदा।
बन्धु रे बान्धव ल्हिके नन्दा जाती जांदो।
कन्नौज को राजा को नन्दा जाती जांदो।
राजा जसीदेव हो नन्दा जाती जांदो।
यात्रा-गीत और आगे बढ़ता है। धर्मियां (ठा0 धर्मसिंह) राजा जसदेव की ‘‘नन्दा-जात’’ का मार्ग निर्देषक बनकर नन्दादेवी के शिखरों की ओर प्रस्थान करता है। विदित नहीं वह यात्रा अपने गंतब्य स्थान तक पहुंची भी कि नहीं उर्गम-ग्राम का दुखान्त लोकगीत कहता है किः-
‘‘ अब पौंछि गे रे ऽऽऽ धर्मिंया
नन्दा कोंट माॅजा ऽऽऽऽ
अब पोंछि गे रे धर्मियां
नन्दा कुण्ड माॅजाऽऽऽऽ
चलण लागी रे धर्मियां ऽऽ
हाू की रे टंकारे ऽऽ
चलण लागी रे धर्मियाॅं ऽऽ
विष की फुंकारें ऽऽऽ
और सम्भवतः उसी समय हिमखण्डों ने खिसक कर राजा जसदेव के समस्त दल को उपने में समेट कर रूपकुण्ड में पाट दिया। उस दल के ध्वंसावषेशों को शताब्दियों बाद कुछ खोजकर्ताओं ने बाहर निकालकर हमारे सामने रखने का कार्य किया…
और उसी तरह आज मैं भी उत्तरांचल के लोकगीतों के ध्वंसावषेशों को समय की खिसकती हुई बर्फीली चट्टानों के मलवे से निकालकर आपके सामने लाने का असफल प्रयास कर रहा हूं! मुझे यह भी विदित नहीं है कि हमारी पीढ़ी के बाद लोकगीतों के संकलन संरक्षण और प्रसार के लिए कितने शोधकर्ता, लेखनी-जीवी और रंगकर्मी आगे बढ़कर अतीत की धरोहर की सम्हाल सकेंगे! यह उनकी आस्था, लगन, श्रम तथा कर्तव्य-निष्ठा पर आधारित है।
मैं और मोहनदा (मोहन उप्रेती) चाहते है कि शैलांचल की लोक संस्कृति में आस्था रखने वाले नई पीढ़ी के लोग, हमारे हाथों से (अब तक किसी भी प्रकार प्रज्वलित रखी हुइर्) मशालें लेकर आगे बढ़ें और सांस्कृतिक पुनरूत्थान के महायज्ञ में ईधन स्वरूप समर्पित हो सकें।_

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स्व0 बृजेन्द्र लाल साह का यह लेख नंदादेवी सन्दर्भ पत्रिका वर्ष 1988 (सम्पादक पी सी जोशी-डा0 निर्मल जोशी, प्रकाशक- कौशल किशोर सक्सेना ) से साभार लिया गया है।

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