अल्मोड़ा का नंदा देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कुमाऊँ की सामूहिक चेतना और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र है। तीन शताब्दियों से अधिक पुराना यह मंदिर उस दौर का साक्षी है जब आस्था और राजनीति एक साथ मिलकर सामाजिक परिवर्तन का आधार बनीं।

1. चंद शासकों द्वारा निर्माण
सत्रहवीं शताब्दी के अंत में चंद वंश ने अल्मोड़ा को राजधानी के रूप में सुदृढ़ किया।
- राजा उद्योतचंद(1690–91) ने यहाँ उद्योतचंदेश्वर और पार्वतेश्वर नामक दो मंदिरों का निर्माण कराया।
- बाद में राजा दीप चंद ने तीसरा मंदिर बनवाया, जो दीपचंदेश्वर कहलाया।
बद्रीदत्तपांडे अपनी प्रसिद्ध कृति “कुमाऊँकाइतिहास” (1937) में उल्लेख करते हैं कि इन मंदिरों ने न केवल धार्मिक धारा को दिशा दी, बल्कि नगर को सांस्कृतिक पहचान भी दी।
2. गोरखा–अंग्रेज संघर्ष और मंदिर परिसर
गोरखा शासनकाल (1790–1815) में यह परिसर दीपचंदेश्वरसमूह कहलाता था। अंग्रेज–गोरखा युद्ध (1815) के दौरान अंग्रेजों ने पहले सिटोली, फिर हीराडूंगरी, और अंत में दीपचंदेश्वर मंदिर में तोपें तैनात कीं। यहीं से गोरखों के लाल मंडी किले पर अंतिम हमला बोला गया।
जॉर्ज ट्रेल, जो 1816 में कमिश्नर बने, उन्होंने मल्ला महल से देवी की मूर्तियों को इस मंदिर परिसर में स्थापित कराया। “अल्मोड़ागजेटियर” (1904) में इस घटना का विस्तार मिलता है। इससे नंदा देवी मंदिर धार्मिक व राजनीतिक, दोनों दृष्टियों से प्रमुख बन गया।
3. राष्ट्रीय चेतना की शुरुआत(1883–1913)
- 1883: इल्बर्ट बिल आंदोलन के समर्थन में अल्मोड़ा की पहली सभा यहीं आयोजित हुई। “कुमाऊँ गजेटियर” और समकालीन हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में इस आयोजन का उल्लेख है।
- 1913 : स्वामी सत्यदेवी परिब्राजक ने यहाँ सभा की और समाज सुधार पर जोर दिया।
- इसी समय लाला लाजपत राय भी अल्मोड़ा आए और हरिजन उत्थान का आह्वान किया।
4. स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र(1922–1935)
बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में यह प्रांगण स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख मंच बन गया।
- 1922 : मोती लाल नेहरूकाभाषण
“दिपायनियर” और “प्रताप” जैसे अखबारों में दर्ज है कि मोतीलाल नेहरू ने यहीं विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान किया। उनका भाषण युवाओं और व्यापारियों को प्रेरित करने वाला सिद्ध हुआ। - 26 जनवरी1930 : पहलाध्वजारोहण
कुमाऊँ केसरी बद्रीदत्त पांडे ने पहली बार इस स्थल पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यह घटना “स्वाधीनता संग्राम में कुमाऊँ की भूमिका” (डॉ. जगमोहन नेगी, 1980) में विस्तार से वर्णित है। - 1931 : जवाहरलाल नेहरू की शपथसभा
नेहरू का भाषण अल्मोड़ा की जनता के लिए प्रेरणा बना। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अंतिम दम तक संघर्ष करने की शपथ दिलाई। - 26 मई1930 : झंडासत्याग्रह
विक्टरमोहनजोशी के नेतृत्व में जुलूस यहीं से नगर पालिका की ओर निकला। दो दिन बाद बद्रीदत्तपांडे के नेतृत्व में दूसरा दल रवाना हुआ। इस सत्याग्रह को “हिमालयन गजेटियर” और “कर्मभूमि” में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। - 1935 : पं. गोविंद बल्लभ पंतकाअभिनंदन
यह आयोजन दर्शाता है कि कुमाऊँ अब केवल परिधि नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की धारा में सक्रिय योगदानकर्ता बन चुका था।
5. स्वतंत्रतासेनानियोंकासंगमस्थल
इस प्रांगण से अनेक प्रखर नेताओं और सेनानियों ने जनता को संबोधित किया। “कुमाऊँ का इतिहास” और समकालीन अखबारों के अनुसार यहाँ मौलाना मोहम्मद अली, शौकत अली, युसुफ मेहर अली, विजयलक्ष्मी पंडित, आचार्य कृपलानी, जमनालाल बजाज, राममनोहर लोहिया, बद्रीदत्त पांडे और विक्टर मोहन जोशी जैसे नेताओं ने अपने विचार रखे।
15 अगस्त 1947 की प्रभात फेरी का प्रारंभ भी इसी स्थल से हुआ—यह घटना “अल्मोड़ा अख़बार” (1947) में प्रकाशित हुई।
6. स्वतंत्र भारत में महत्व
आज़ादी के बाद भी यह स्थल राजनीतिक संवाद का केंद्र बना रहा। मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, नारायण दत्त तिवारी, कृष्ण चंद्र पंत, सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं ने यहाँ भाषण दिए।
1982 में मंदिर के ऐतिहासिक एवं पुर्रातात्विक महत्व को देखते हुए उत्तर प्रदेश पुरातत्व संगठन ने इसे अपने संरक्षण में लेने का प्रस्ताव पारित किया था,तथा तत्कालीन प्रदेश सरकार ने इसे इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया ।वर्तमान में मंदिर उत्तराखंड पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है तथा मानस माला योजना के अंतरगगत विकास कार्य किये जा रहे हैं। वर्ष 2000 में यहीं से महामंडलेश्वर परेशयति ने कुमाऊँ की ऐतिहासिक नंदा राजजात यात्रा का शुभारंभ किया।
नंदा देवी मंदिर अल्मोड़ा की आस्था और स्वतंत्रता संघर्ष का जीवंत प्रतीक है। यह स्थल दर्शाता है कि पर्वतीय नगर भी राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में उतने ही सक्रिय थे जितने बड़े महानगर। स्थानीय अखबारों, बद्रीदत्त पांडे की “कुमाऊँ का इतिहास”, अल्मोड़ा गजेटियर और समकालीन संस्मरणों से यह स्पष्ट होता है कि यह प्रांगण न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र रहा, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम का भी धड़कता हुआ हृदय था।



