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उत्तराखंड में कुबेर

उत्तर दिशा के दिक्पाल कुबेर धन व विलास के देवता कहे गये हैं। वे यक्षों के अधिपति हैं। प्राचीन ग्रंथों में उन्हें वैश्रवण, निधिपति एवं धनद नामों से भी सम्बोधित किया गया है। वे ब्रहमा के मानस पुत्र पुलस्त ऋषि तनय वैश्रवा के बेटे माने गये हैं। वैश्रवा सुत होने के कारण ही उन्हें वैश्रवण नाम दिया गया है। वराह पुराण में कहा गया है कि उन्हें ब्रहमा ने देवताओं का धनरक्षक नियुक्त किया था। यजुर्वेद में काम के अधिष्ठाता देवता के रूप में सभी अभिलाषायें पूर्ण करने वाले वैश्रवण का उल्लेख आता है। प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि उत्तर दिशा में जीवन के स्वस्थ उपभोग पर विश्वास करने वाली यक्ष संस्कृति भी फेली हुई थी जिसने काव्य और ललित कलाओं का सर्वाधिक प्रसार किया। कालीदास ने कुबेर की राजधानी अलका बताई है जो हिमालय में स्थित हैै। महाभारत में जिस मणिभद्र यक्ष का जिक्र है, वह बद्रीनाथ के पास माणा में ही निवास करते थे।

भारत में कुबेर पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है। उत्तराखंड में भी जाख और जाखिणी शब्द अत्यंत प्रचलित है। इन्हें ग्राम रक्षक भी माना जाता है। यहां भी यक्ष पूजा की प्राचीन परम्परा के अनेक प्रमाण मिलते हैं। परन्तु उनका कोई स्वतंत्र मंदिर अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। कुमाऊँ से यक्षों की अनेक प्रतिमायें प्रकाश में आयी हैं । परन्तु समय की मार से उनमें से अधिकांश दयनीय स्थिति में आ गयी है। इनमें राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा में प्रदर्शित तीसरी शती ई0 की यक्ष प्रतिमा इस क्षेत्र से अब तक प्राप्त यक्ष प्रतिमाओं में सर्वाधिक प्राचीन मानी जा सकती है।

प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथों के अतिरिक्त जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में भी यक्षों के चित्रण की परम्परा थी। लौकिक देवताओं के रूप में भी वे पूजे जाते थे । कुबेर प्रतिमाओें के निश्चित लक्षण निर्धारित हैं। वराहमिहिर के अनुसार यक्षराज कुबेर को सत्ता के प्रतीक मानव विमान युक्त प्रदर्शित किया जाना चाहिये जो किरीट-मुकुट धारण करें हो तथा विशाल उदर वाले निर्मित होने चाहिये। मत्स्य पुराण में उनको विशाल शरीर, लम्बे उदर, अष्टनिधियों सें युक्त, धवल वस्त्रों से आभूषित, अलंकृत कुंडल, सुन्दर हार एवं बाजुबंध धारण किये, किरीट से अलंकृत तथा नरयुक्त विमान पर विराजमान दिखाने का उल्लेख है। परन्तु अग्निपुराण में कुबेर केा आयुध सहित मेष पर आरूढ़ निर्मित करने का विधान किया गया है। विष्णुधर्माेत्तर जैसे ग्रंथों में उन्हें उदीच्यवेश, कवच, बाईं गोद में पत्नी ऋद्धि को धारण करे हुए चार हाथ एवं रत्नपात्र से अलंकृत बताया गया है। कुबेर कमल के समान श्वेत, स्वर्ण के समान पीली आभा वाले कहे गये है तथा उनके वस्त्र भी पीले बताये गये हैं। स्वर्ण को सर्वश्रेष्ठ धन माना गया है, इसलिए स्वर्ण के द्योतक उनके पीत वस़्त्र हैं। उनके अतीव बली हाथ उनकी अपार शक्ति के प्रतीक हैं। उनके हाथ में सदा रहने वाला गदा दंड नीति का परिचायक है। उनकी पत्नी ऋद्धि देवी जीवन यात्रा की सकारात्मकता की प्रतीक है। रत्नपात्र उनके गुणों को प्रदर्शित करता है जबकि नर-विमान पर आरूढ़ होना उनकी राजसत्ता का प्रमाण है । शंख और पद्म निधियों को प्रदर्शित करते है। धान के तोड़े से बनी, नेवले की आकार की थैली जिसे नकुली कहा जाता है उनके हाथ में होती है । धन के देवता के हाथ में यह थैली कुबेर प्रतिमा का आवश्यक अंग है।

राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा

इस क्षेत्र में कुबेर की मधुपान करती कुछ अत्यंत सुन्दर प्रतिमायें हैं जिनके कला पक्ष पर विस्तार से चर्चा ही इस लेख का उद्देश है। मधुपान करती यक्षराज कुबेर की प्रतिमा इस क्षेत्र की दुर्लभ कलानिधि है। यहां कुबेर को दिक्पाल के रूप में चित्रित न कर धनपति एवं यक्षराज के रूप में चित्रित किया गया है। इस द्विभुजी प्रतिमा में अर्धपर्यक मुद्रा में बैठे, अत्यंत सुगठित शरीर वाले परन्तु महोदर कुबेर की प्रतिमा में सुन्दर देव को स्कन्धों तक विस्तारित पद्म प्रभामंडल से अलंकृत, मुकुट से सज्जित, ग्रेैवेयक, बाजूबंध से अलंकृत कर अभिलिखित पादपीठ पर बैठा दर्शाया गया है । उनके एक कान में रत्नकुंडल तथा दुसरे में वृत्त कुंडल है। छोटा सा मुकुट उनकी अलकों को ढंक रहा है। वे एक हाथ से मुख के नजदीक सुरा पात्र पकड़े तथा दूसरे हाथ से जंघा के ऊपर नकुल को पकड़े हैं। घुटना धोती से आवृत्त है। मथुरा संग्रहालय में भी उनकी कुछ अत्यंत प्राचीन प्रतिमायें इसी प्रकार चषक तथा नकुल को धारण किये प्रदर्शित रही हैं। उनके पाश्र्व में खडी परिचारिका अथवा उनकी पत्नी ऋद्धि हैं जिनके हाथ में भी घट सदृश सुरापात्र है। चेहरे पर मंद मुस्कान सहित भारी भरकम शरीर वाले कुबेर अर्धउन्मीलित आंखों से निहार रहे हैं। इस प्रतिमा में सुरा को उढे़लते हुए प्रदर्शित नहीं किया गया है। परन्तु मुखमुद्रा से ऐसा अवश्य प्रतीत होता है कि वे सुरापान का आनंद ले रहे हैं। महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मांस तथा सुरा यक्षों का प्रिय भोजन कहा गया है । कालीदास ने मेघदूत में भी यक्षों द्वारा रमणियों के साथ कल्पवृक्ष से उत्पादित सुरा पीने का उल्लेख किया है। इसलिए उत्तराखंड में भी मधुपायी कुबेर की उपस्थिति अस्वाभाविक नहीं है। यह प्रतिमा वाहन विहीन है। पादपीठ पर अंकित लेख उसे 9वीं शती का प्रमाणित करता है। कदाचित कुबेर की इस क्षेत्र में यह प्रथम अभिलिखित प्रतिमा है जो शैली की दृष्टि से दुर्लभ मानी जा सकती है

एक अन्य प्रतिमा में विशाल शरीर वाले लम्बकर्ण देव मुकुट, कुन्डल, बाजूुबंध, गले में कंठा पहने हुए ग्रैवेयक एवं पाद आभूषणों सहित दर्शाये गये है। दीर्घ नाभि, विशाल उदर वाले देव की पादपीठ पर निधिपात्र अंकित है। उनके एक हाथ में सुरापात्र तथा दूसरे हाथ में नकुल है। सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह प्रतिमा अपने आप में अनूठी है।

कुबेर की कुछ अन्य अर्धनिर्मित प्रतिमायें भी मिली हैं। जिससे पता चलता है कि सम्भवतः यहां प्रतिमायें गढ़ने की कोई इकाई ही रही होगी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है इस क्षेत्र में पायी गयी कुबेर की इन प्रतिमाओं ने इस क्षेत्र की शिल्पनिधि की श्रीवृद्धि का और अधिक विस्तार किया है।

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