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एक हथिया नौला- चम्पावत

चम्पावत-मायावती मार्ग पर ढकना ग्राम में उत्तराखंड का प्रसिद् नौला एक हथिया नौला स्थित है। किंवदन्ती हैं कि जिस कलाकार ने बालेश्वर मंदिर और एक हथिया देवाल बनाये उसी कलाकार का एक हाथ राजा ने अपने दुष्ट सामंतों के कहने पर कटवा दिया। यह कलाकार विपिन्न अंवस्था में अपनी अल्पवयस्क पुत्री को साथ लेकर प्राणभय से जंगल के आश्रय में आ गया। अपनी इसी अल्पवयस्क पुत्री के सहयोग से इस कलाकार ने एक हथिया नौले के विशिष्ट शिल्प को भी प्रतिशोध रूप में जन्म दिया ।

लोक मान्यता है कि पांडव जब इस क्षेत्र में आये थे तब उन्होंने देवालयों के निर्माण की ऐसी परम्परा को जन्म दिया जिसमें देवालय केवल एक रात में ही बनाकर पूर्ण किया जाता था। यह प्रथा चंद राजाओं के समय तक चलती रही। एक हथिया नौले के सम्बन्ध में भी यह धारणा है कि इसका निर्माण भी एक रात में ही किया गया था। परन्तु रात भर में कार्य पूरा नही हो सका इसलिए प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जा सकी ।

वास्तुकला की दृष्टि से इस नौले की संरचना जगती पर आधारित है। तलछंद योजना में वर्गाकार जलाशय दो स्तम्भों पर आधारित वितान सहित बनाया गया है। कुंड के चारों ओर प्रसाधित प्रस्तर खंड की दीवारें हैं।

जिनमें भित्तियां प्रफुल्लित पद्म से अलंकृत हैं। जंघा भाग तीन सज्जायुक्त पट्टियों से सजाया गया है। सबसे नीचे ज्यामितीय अलंकरण है। फिर थोड़ा विराम देकर मानवाकृतियां बनायी गयी हैं। वितान के सर्वोच्च भाग में दम्पत्तियुक्त रथिकाएँ हैं।

प्रवेशद्वार की रथधिकाओं में गणेश स्थापित हैं। वितान को तीन भागों में विभाजित कर विभिन्न अभिप्रायों से सजाया गया है । इस नौले का भीतरी भाग वर्गाकार है तथा ऊँचाई लगभग साढ़े चार मीटर है। पूरे नौले का निर्माण स्थानीय पत्थरों को जोड़कर किया गया है। कुंड चैकोर सीढियों से घिरा हुआ है। दक्षिणी दीवार में दो स्तम्भों पर आधारित बरामदा है । द्वारके दोनों ओर दो छोटे-छोटे चबूतरे बनाये गये हैं। शिल्प एव शैली की दृष्टि से स्मारक की सम्पूर्ण भित्तियां मंदिरों की अनुकृतियों, मानवाकृतियों एवं विभिन्न प्रकार की नक्काशी से साम्य रखती प्रतीत होती हैं।दो मीटर ऊँची दीवारों को दो भागों में बांटा गया है।

सबसे नीचे के हिस्से में दो सादे बार्डर बनाये गये है। सादी पट्टी के ऊपर मानवाकृतियाँ बनायी गयी हैं। इसमें नृत्यांगनाओं, वादिकाओं तथा पूजन के लिए तैयार स्त्रियों एवं देवाकृतियों के चित्र हैं। सामान्य मानवाकृतियां भी अलंकृत की गयी हैं। प्रवेशद्वार भी देवकुलिकाओं की आकृतियों, से सजाये गये हैं। इसके ऊपर छत का वृत्ताकार भाग प्रारम्भ हो जाता है। इसमें युगल पक्षी, युगल आकृतियाँ, विद्याधर बनाये गये हैं। प्रवेशद्वार की रथिकाओं में गणेश स्थापित किये गये हैं। बरामदे की दीवारों पर भी भीतरी दीवार की तरह ही देवकुलिकाऐं बनायी गयी हैं। बरामदे की छत को सोपानों में उठाया गया है इसमें नृत्यागनाआं के चित्र विशेषरूप से दर्शनीय हैं। द्वितीय पट्टी में कुल्हाडी़ जैसी वस्तु हाथ में लिए आकृति है तृतीय पंक्ति में सर्पारूढ़ पुरूष, बरामदे में अश्वारोहियों की प्रतिमाएँ बनायी गयी हैं। वितान में संयुक्त शीर्ष वाली पांच नर्तकियां भी विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। सभी स्त्री आकृतियाँ चोली, ओढ़नी तथा पांव की पाजेब सहित दृष्टिगोचर होती हैं।

स्मारकों को बचाएं, विरासत को सहेजें
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