प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर अल्मोड़ा कुमाऊँ का प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर है। इसके
रमणीक सौन्दर्य से प्रभावित देश-विदेश से पर्यटक आध्यात्मिक अनुभूति तथा प्राकृतिक सौन्दर्य
के रसास्वादन के लिए भारी संख्या में अल्मोड़ा आते हैं। प्रतीत होता है कि प्रकृति निर्माता ने
इसे सप्त रंगों की तूलिका से विश्राम के क्षणों में ही आकार दिया एवं इसके सौन्दर्य को
संवारा। अपनी समृद्ध विरासत के कारण इसे कुमाऊँ की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है।

नगर में मंदिरों की बहुतायत होने के कारण इसे मंदिरों का नगर भी कहा जाता है।
अल्मोड़ा नगर के दक्षिण पूर्व में सुआल नदी पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर तथा कोसी नदी
उत्तर से दक्षिण पूर्व की ओर प्रवाहित होकर क्वारब में मिलती हैं। कसारदेवी, स्याहीदेवी एवं
बानड़ीदेवी की पर्वत श्रंखलायें इसके तीन ओर विराजमान है।
इस नगर की स्थापना चंद राजवंश द्वारा अपनी राजधानी को चम्पावत से अल्मोड़ा
स्थानान्तरित करने पश्चात सन् 1563 में की गई। चंद राजवंश के पतन के बाद भी गोरखों
तथा अंग्रेजों के शासन काल में इसका राजनैतिक महत्व कम नहीं हुआ। उन्होने भी इसे
अपनी प्रशासनिक राजधानी बनाये रखा।
जलवायु जनजीवन के अधिक अनूकूल होने के कारण इसे स्वास्थ की दृष्टि से आदर्श पर्वतीय
नगर माना जाता है। गर्मियों में ना तो यहां अधिक गर्मी पड़ती है ना सर्दियों के मौसम में अन्य
पर्वतीय इलाकें के विपरीत अत्यधिक ठंड ही पड़ती है। बरसात का पानी ढलानों पर बह जाने
के कारण भी प्रकृति स्वंय इसे साफ सुथरा रखने में मदद करती है।
अपने सौन्दर्य के लिए विख्यात यह हिमालयी नगर दार्शनिकों, साहित्यकारों, चिंतकों एवं
आध्यामिक साधकों को लुभाता रहा है। स्वामी विवेकानंद इस नगर में तीन बार आये।
आनंदमयी मां, लामा गोविन्दा, श्री कृष्णप्रेम, सोमवारी महाराज, हेड़ाखान बाबा, महादेवगिरी,
नींबकरोरी, नान्तिन बाबा, नारायण स्वामी, भगनी निवेदिता, निराकार संत शून्यता जैसे
आध्यात्मिक साधक एवं महात्मा गांधी, श्रीमती कस्तूरबा गांधी, मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन
मालवीय, नृत्य सम्राट उदयशंकर, जोहरा सहगल, गुरूदत्त, चित्रकार ब्रूस्टर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ
टैगोर, वैज्ञानिक बोसीसेन एचं बीरबल साहनी, विदुषी आइरिन पंत, संगीतज्ञ उस्ताद
अलाउद्दीन खां एवं चन्द्र शेखर पंत जैसी विभूतियों ने अल्मोड़ा में प्रवास कर यहां की श्री
वृद्धि की। मलेरिया परजीवी की खोज करने वाले रोनाल्ड रास का जन्म यहीं हुआ था।
पंडित गोविन्दबल्लभ पंत, पंडित हरगोविन्द पंत, विक्टर मोहन जोशी, कामरेड पी सी जोशी, कुमाऊँ
केसरी बद्रीदत्त पांडे, सोबन सिंह जीना, मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के अतिरिक्त भी अनेकों
शख्सीयतों ने अल्मोड़ा को अपनी कर्मभूमि बनाया। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान यहां के जिला
जेल में अनेक अन्य महापुरूषों के अतिरिक्त पंडित जवाहरलाल नेहरू भी दो बार रहे।
स्वाधीनता की आवाज को बुलन्द करने तथा समाज सुधार को जिन अखबारों ने अपना लक्ष्य
माना उनमें से अल्मोड़ा अखबार, स्वाधीन प्रजा, शक्ति एवं समता भी अल्मोड़ा से ही प्रकाशित
होते थे।
प्रकृति यहां पल-पल में अपना रूप बदलती है। नगर और इसके आसपास से हिमालय की
हिमाच्छादित चोटियों नंदादेवी, पंचाचूली, त्रिशूल, नीलकंठ, चौखंबा के विहंगम सौन्दर्य को
अपलक निहारा जा सकता है।
स्वामी विवेकानंद से सम्बन्धित विभिन्न स्थल, रामकृष्ण कुटीर, नंदादेवी मंदिर,टैगोर हाउस,
मां आनंदमयी आश्रम, ब्राइटन कार्नर, शारदामठ, बौद्ध आश्रम, कसारदेवी मंदिर एवं शिलालेख,
चितई का गोल्ल मंदिर, धार की तूनी स्थित हुसैनअली शाह की मजार, मृगबिहार, सिमतोला
इको पार्क अल्मोड़ा के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल हैं। कटारमल सूर्य मंदिर एवं लखुडियार के प्रागैतिहासिक शैलचित्र भी यहां से थोड़ी ही दूर हैं। अल्मोड़ा की पारंम्परिक रामलीला लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी है। अल्मोड़ा के नंदादेवी मेले, दशहरे तथा बैठकी होली की ख्याति दूर-दूर तक है।
शै भैरव मंदिर की शनिवार को सम्पन्न होने वाली आरती तथा नंदादेवी मंदिर की प्रतिदिन होने
वाली सायंकालीन भावप्रवण आरती पर्यटकों के लिए आकर्षण होती है।
ताम्र उद्योग अल्मोड़ा का परम्परागत हस्तशिल्प है।अल्मोड़ा की बालमिठाई की तो ख्याति ही अलग है।
अल्मोड़ा के सौन्दर्य को निहारते हुए विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी कवि एलन गिंजबर्ग ने लिखा है
- विश्व के अन्य स्थानों की अपेक्षा अल्मोड़ा कहीं ज्यादा सरल, सुलभ तथा आध्यात्मिक है।
ज्ञान की तलाश कर रहे साधकों के लिए यह किसी स्वर्ग से कम नहीं है।



