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बाखली – जहाँ दिल-दीवारें साझा थीं

पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीण इलाकों में पत्थर और पटाल से बने संयुक्त घरों की लंबी कतारें सहज ही आकर्षित करती सी लगती हैं। इन्हें बाखली कहते हैं। आज के ‘फ्लैट कल्चर’ और बंद कमरों के दौर में, बाखली की अवधारणा हमें संयुक्त परिवारों के एक ही स्थान पर रहने की याद दिलाती है।

ये मकान सिर्फ निर्जीव पत्थरों से बनी शिल्प संरचनायें नहीं हैं अपितु कुमाऊँनी जनजीवन के सामूहिक निवास की शैली का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। बाखली का अर्थ है—भूमितल के समानान्तर एक ही रेखा में विस्तार पाये कई स्वतंत्र घर जो ना केवल एक दूसरे के पूरक होते थे अपितु जिनका आंगन साझा होता था, छतें एक दूसरे से जुड़ी होती थीं । पुराने भवनों के निर्माण में सुरक्षा और सामाजिक जुड़ाव के लिए इसी तरह की भवन निर्माण शैली विकसित की गईं थी। इन घरों की बनावट जलवायु-अनुकूल, वैज्ञानिक और पारंपरिक थी।

ये भवन प्रायः दो मंजिले होते थे। नीचे की मंजिल दो हिस्सों में विभक्त होती थी, जिन्हें गोठ और गोठमाल कहा जाता था। बिना दरवाजों वाला बाहरी हिस्सा गोठमाल और बंद दरवाजों वाला अंदर का भाग गोठ कहलाता था। पालतू और दुधारू पशुओं को सुरक्षा की दृष्टि से गोठ में रखा जाता था। गोठ की गर्माहट से ऊपर की मंजिल यानी ‘चाख’ सर्दियों में भी गरम रहती थी। कटों पत्थरों की भारी भरकम दीवारों को पुरखों से मिले ज्ञान से बनाये गये पलस्तर में कंकड़ रहित छनी मिट्टी, चीड़ की पिरूल, बाबिला घास और अनाजों की भूसी को मिलाकर बने गोबर के पलस्तर के प्रयोग से तापरोधी बना कर संवारा जाता था ।भवन की बाहरी दीवारों पर प्रायः पलस्तर नहीं किया जाता था। पत्थरों के जोड़ को टीप लगाकर अवश्य ढका जाता था। चीड़ के मजबूत तने और डंडियों का आधार बनाकर उस पर पटाल की छत टिकाई जाती थी। छतों पर बिछे स्लेट के पत्थर (पटाल) न केवल बारिश से बचाते थे, बल्कि पहाड़ की विषम जलवायु के प्रतिरोध की दृष्टि अनुकूल थे।

सोनू सिजवाली

जानवरों के चारे के लिए छतों पर रखे घास के बोझ—लूटे मकान की रंगत को संवारते थे तो धान की कुटाई के दृश्य नीरवता में भी संगीत भरते थे। आलू,पिनालू,गंडेरी इत्यादि को बेमौसम प्रयोग करने के लिए मादिरे या धान के भूसे में दबा कर रख दिया जाता था।इसके लिए भी कई बार गोठ का प्रयोग किया जाता था। परिवार का विस्तार बाखली का विस्तार बन जाता था। रौन, धूघर,डंडियालो जैसे शब्दों से बाखली की सम्पूर्णता का समर्थन होता था तो अनाज सुखाती महिलायें इस भव्यता का श्रंगार। छोटे दरवाजे सन्देश देते थे कि मकान में सिर झुका कर विनम्रता से ही प्रवेश करना चाहिये। त्योहारों और अनुकूल अवसरों पर बने ऐपण भवन को नयनाभिराम बना देते थे। ये वे घर थे जिनमें एक परिवार के घर आए मेहमान का स्वागत बाखली के सभी रहवासी एक साथ खड़े होकर करते थे। एक घर का मेहमान पूरी बाखली का मेहमान होता था।

साझा आंगन खुशियों का रंगमंच होता । बाखली की आत्मा उसके ‘साझे चौक’ के उत्सवों में बसती थी। सच में बाखली ग्रामीण जनजीवन की सामूहिकता और वास्तुकला का बेजोड़ संगम था । इन पुरानी बाखलियों में इतिहास आज भी साँस लेता है । कहा जाता था कि बाखली सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि एक विचार है—मिलकर रहने का, सुख-दुख साझा करने का।

सुबह की पहली किरण के साथ यहाँ जीवन शुरू होता था। महिलाएं धूप में बैठकर काम निपटाती थीं, और बच्चे एक छोर से दूसरे छोर तक बेखौफ दौड़ते-खेलते थे।

त्योहारों के समय बाखली का रूप निखर उठता था। चाहे दिवाली की दीया-बाती हो या ऐपण की लंबी कतार, वह एक घर की दहलीज पर खत्म नहीं होती थी, बल्कि बाखली को एक सूत्र में पिरो देती थी। ‘बैठकी होली’ के राग जब एक घर से उठते थे, तो समूची बाखली के आंगन में गूंजते थे। बधाई देने आये होल्यार सामूहिक गायन कर पूरी बाखली के घर-पटांगण को होली के गीत -रंगों से भर देते थे।

रोहित साह

लेकिन अब लगता है कि पुरानी परम्पराओं और पहाड़ी समाज का ध्वजवाहक यह भवन शिल्प आधुनिकता की अन्धी दौड़ में बिला गया है, खो गया है ।

जर्जर और वीरान होती इन इमारतों को देखकर तो यह लगता है कि इन ऐतिहासिक बाखलियों पर आधुनिकता का दंश लग गया है। शिक्षा और रोज़गार की तलाश में युवा बाहर चले गए, समुचित स्वास्थ एवं चिकित्सा सुविधा पाने की मजबूरी ने बुजुर्गों को अपने पुश्वतैनी घर छोड़ने पर विवश कर दिया जिससे कई पुरानी बाखलियां अब निर्जन घरों में बदल चुकी हैं। भवन निर्माण की नई तकनीकी ने पुरानी संरचनाओं को रौंद दिया है। पटालों की जगह अब सीमेंट के लेंटर ले रहे हैं, बाखली की प्राचीन सुंदरता और थर्मल इंजीनियरिंग खोती जा रही है।

नैनीताल जनपद के रामगढ़ विकासखंड के कुमौटी ग्राम की बाखली कुमाऊँ की सबसे बड़ी बाखली कही जाती है जिसमें अनेक परिवार आज भी निवास करते हैं। यह बाखली अल्मोड़ा रामगढ़ मोटर मार्ग से स्पष्ट दिखाई देती है। बताया जाता है कि कभी इस बाखली में 38 परिवारों के 168 लोग रहते थे। लेकिन अब कई परिवार यहां से भी पलायन कर गए हैं। इनके घरों में ताले लटके नज़र आते हैं। कभी-कभी ही इन घरों के ताले खुलते हैं।।

हांलांकि अब उत्तराखंड सरकार ने कुमौटी ग्राम की बाखली को प्राणदान देने का निश्चय किया है। लगभग 50 लाख की राशि से इस बाखली को संवारा जायेगा लेकिन दूर दराज गांव देहातों में ऐसी न जाने कितनी बाखली उन लोगों का इंतजार कर रही हैं जो उन्हे छोड़कर चले गये और फिर वापस नहीं लौटे।

स्मारकों को बचाएं, विरासत को सहेजें
Protect your monuments, save your heritage

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