
कुमाऊँ क्षेत्र में पारंपरिक मकानों की सबसे बड़ी विशेषता उनका नक्काशीदार, भव्य एवं विशाल मुख्य प्रवेशद्वार है जिसे स्थानीय भाषा में खोली कहते हैं। खोली इन मकानों की भावनात्मक पहचान है। यह द्वार केवल घर के अंदर आने का रास्ता न होकर, कुमाऊँ की समृद्ध काष्ठकला का एक बेजोड़ नमूना भी है। यह स्थानीय समाज के मान-सम्मान, कलात्मक वैभव और आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक है। खोली को घर का पवित्र हिस्सा माना जाता है।
पुराने समय से ही सुन्दर और अलंकृत खोली एक परंपरा बन चुकी थी जिसका निर्माण अपनी हैसियत को बताने के लिए उसे विशाल एवं भव्य बनवा कर किया जाता था। सामान्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी थोकदार भारी भरकम खोली का निर्माण करवाते थे। यहां खोली का महत्व लकड़ी के एक संरचनात्मक ढांचे तक सीमित नहीं था , बल्कि घर की समृद्धि, कला और परंपरा का दर्पण होता था । यह परिवार की सामाजिक स्थिति का परिचायक भी होती थी। जितना प्रभावशाली और समृद्ध परिवार, उतनी ही शानदार नक्काशी और भारी भरकम खोली । माना जाता था कि खोली वह स्थान है जहाँ से परिवार की खुशियाँ भीतर आती हैं ।

कुमाऊँ मंडल के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पुराने दरवाजे और खिड़कियां, जिनके ऊपर महीन नक्काशी की गई है, मौजूद हैं। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चम्पावत तथा बागेश्वर इस कला में अति समृद्ध हैं। खोली में लकड़ी तराशने की बारीक नक्काशी की कला को लिखाई कहा जाता है।

इस क्षेत्र में भवन निर्माण तथा बाह्य संरचना में लकड़ी का अलंकरण के लिए व्यापक उपयोग हुआ है। नक्काशी के लिये लकड़ी प्रायः बिना लीसा निकाले चीड़, तुन या देवदार की प्रयोग की जाती थी। पवित्रता, दीर्घायु तथा लिखाई क्रिया में सुविधा जनक होने के कारण देवदार का प्रयोग भवनों के काष्ठ अलंकरणों में तथा तुन और चीड़ का प्रयोग सामान्य रूप से भवन के सौन्दर्य वृद्धि के लिए भी होता था। कहीं-कहीं अखरोट की लकड़ी का भी प्रयोग मिलता है।
प्राचीन समय से ही खोली बनाने के निश्चित मानदंड निर्धारित हो चुके थे जिन्हें पुराने मंदिरों के प्रवेश द्वार से लिया गया था। अंग निर्धारण में भी मंदिरों के प्रवेशद्वारों की निर्माण शैली एवं कला परंपरा को ग्रहण किया गया ।
भवन की विशालता के आधार पर खोली की संख्या एक से अधिक भी हो सकती है । यह प्रायः तीन से साढ़े तीन फुट चौड़ी तथा सात या आठ फिट ऊंची हो सकती है । खोली के मुख्य स्तम्भ द्वारक खाम कहलाते हैं । इसके ऊपर की क्षैतिज शहतीर को पटाव कहते हैं। पटाव के बाह्य परिकर पर देव आकृतियाँ उत्कीर्ण की जाती हैं । खोली के मस्तक-भारपट्ट या पटाव के बीच में यहां भी परम मांगलिक गणेश विराजमान रहते हैं। उन्हें विघ्नहर्ता और शुभ का प्रतीक माना जाता है। विश्वास है कि विघ्नहर्ता द्वार पर विराजमान होकर घर को हर बुरी बला से बचाते हैं। राम-लक्ष्मण को कंधे पर बैठाए हुए हनुमान का अंकन तथा सिंहवाहिनी दुर्गा भी सर्वप्रिय अभिप्राय थे। अधिकांश आकृतियां पटाव पर वर्गाकार उभार वाले पैनलों के अन्दर होती हैं जो देवाकृतियों से सजे होते हैं । इधर-उधर फूल एवं बेलबूटे बनाकर इन पैनलों को भव्य रूप दिया जाता था ।

एक ही शहतीर के बने पटाव के कोनों पर अक्सर थोड़ी खोखली जगह छोड़ दी जाती थी, जिससे गौरैया या अन्य पक्षी वहाँ अपना घोंसला बना सकें। यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का एक अद्भुत मानवीय पहलू था। बाहर निकले अलंकृत तोड़े जैसी संरचनाओं में विभिन्न पशु-पक्षियों की आकृतियां निरूपित की जातीं थीं । इनमें हाथी, घोड़े, मोर, तोता, नाग प्रमुख थे।

खोली की लंबवत संरचना को पट्टियों में विभक्त किया जाता था। दरवाजे के आकार के अनुसार इसमें भारी वजन के स्तम्भ -द्वारक खाम लगाने के लिए ऐसा तना छांटा जाता था जिसकी मोटाई पर्याप्त हो तथा वह मजबूत दरवाजों को संभाल सके। लम्बाई के अनुसार इसको सात तक लम्बवत पट्टियों में तराश दिया जाता था । दीवार से सटी पट्टी को कई बार फूल और बेलबूटे से सजाया जाता था। द्वारक खाम को मध्य में ऊपर की ओर मेहराब से जोड़कर सजाया जाता था ।

द्वारक खाम में नीचे की ओर मांगलिक प्रतीक घड़े को पत्र पुष्पों से सजा कर घट-पल्लव बनाया जाता था ।मंगल कलश और पल्लव खुशहाली और निरंतरता के प्रतीक हैं। खोली पर केवल देवताओं के ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव के भी दर्शन होते हैं। नक्काशी में हाथी (शक्ति), घोड़ा (गति), मोर, तोता और मछली जैसे शुभ जीव उकेरे जाते हैं। कभी-कभी दशावतार की आकृतियाँ भी खोली को एक मंदिर जैसा रूप दे देती थीं।

दरवाजे काफी भारी होते थे । इन पर कभी सादे तो कभी पुष्प लतायें, राजपुरुष, महिलाऐं, शस्त्रधारी योद्धा, हनुमान, गणेश, अश्व, गज, सिंह, युगल तोते, मछली, दशावतार आदि अंकित किये जाते थे ।
आज भी खोली की देहली को बहुत सम्मान दिया जाता है। त्योहारों और शुभ कार्यों, नामकरण या विवाह जैसे शुभ अवसरों पर खोली की देहली को ऐपण से सजाया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि इस अवसर पर घर में प्रवेश करने वाले मेहमान का उल्लास के साथ स्वागत है।
लेकिन खोली निर्माण की इस कला को वन संरक्षण अधिनियम और मंहगाई की मार ने समाप्त प्रायः दशा में पहुंचा दिया है। कारीगरों का अभाव होता जा रहा है। पूरे क्षेत्र में मात्र एक-दो कारीगर परिवार ही इस प्राचीन और पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं। बहुत मुश्किल लग रहा है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह कला बच पाएगी।

