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उत्तराखन्ड के ताल वाद्य – “दमुआ-ढोल”

भारतीय आध्यात्मिक चेतना में नटराज शिव का आवास कैलाश पर्वत पर स्थापित है और हिमालय का समूचा शिवालिक अंचल शिव की रंगस्थली है। संगीत के आदि प्रतिपादक आदिदेव शिव के कण-कण में रमे होने के कारण ही देवभूमि का लोकजीवन भी नाद ब्रह्म से परिपूर्ण है। शिव तथा शक्ति के प्रतीक भारतीय संगीत में ‘ता’ तथा ‘ल’ माने गए हैं। इस आधार पर शब्द ‘ताल’ शिव तथा शक्ति के संयोजन का परिणाम है। जहाँ लय जीवन की गति को व्यक्त करती है वहीं ताल काल की गति को आबद्ध करती है। सृष्टि के जड़-चेतन सभी काल के सिद्धांत से आबद्ध हैं।

वैदिक साहित्य में अनेक अवनद्ध ताल (नगाड़ा वाद्य) पक्षों के बीच ताल देने के लिये प्रयुक्त किए जाते हैं। यथा दुन्दुभी का उल्लेख मिलता है। अनेक वैदिक ऋचाओं में संगीत को महत्त्व प्रदान किया गया है। एक वैदिक ऋचा में दुन्दुभी (ढोल) का उल्लेख निम्नानुसार किया गया है:

कौशल सक्सेना

“यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलवाः।

युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो नो भूमिः प्रणुदताम्॥

यस्यां वदति दुन्दुभी। सपत्नानसपत्नं नो यः पृथ्वी कृणोतु।” – (अथर्ववेद 12-1-41)

वैदिक काल में युद्ध और शांति दोनों अवस्थाओं में दुन्दुभी को विशेष महत्व मिला है। रथों की दौड़ में उत्साह संचार के लिए दुन्दुभी बजाई जाती थी। धार्मिक आख्यानों में सतह दुन्दुभीयाँ यज्ञ स्थल के समीप रखी जाती थीं जिन्हें वाजपेय यज्ञ के मध्य बजाने का विधि विधान था। अथर्ववेद की एक ऋचा में दुन्दुभी की स्तुति की गई है जिसमें वनस्पति तथा मृगचर्म से निर्मित दुन्दुभी को देवों द्वारा दैत्यों को पराजित करने का साधन बतलाया गया है।

वैदिक साहित्य में ‘भूमि दुन्दुभी’ नामक वाद्य का उल्लेख है। उसको बजाने की प्रक्रिया में एक गड्‌ढा खोदा जाता था जिस पर बैल की खाल को रखकर लकड़ी के कीलों की सहायता से भूमि पर ठोक दिया जाता था। दुन्दुभी के प्रकारान्तर को प्राचीन लकड़ी के ढोलों से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। इण्डोनेशिया, मलेशिया आदि देशों के कतिपय कबीलों में आज भी इस प्रकार के ढोल बनाए जाते हैं जिन पर आदिवासी महिलाएँ नृत्य कर ताल उत्पन्न करती हैं।

कौशल सक्सेना

रामायण तथा महाभारत दोनों ही महाकाव्यों में ढोल के एक अन्य प्रकारान्तर ‘भेरी’ का उल्लेख किया गया है। जब हनुमान को रावण के सम्मुख प्रस्तुत किया गया तो रावण ने शंख तथा भेरी के घोष के मध्य दण्डादेश सुनाया। महाभारत में योद्धाओं में उत्साह का संचार करने तथा प्रतिपक्ष को आतंकित करने के लिये ढोल वादन का उल्लेख है।

सिंधु घाटी सभ्यता में भी तालवाद्यों की उपलब्धता के प्रमाण हैं। उत्खनन से प्राप्त एक मूर्ति में एक महिला को डमरू लिए उकेरा गया है। ईसा से 200 वर्ष पूर्व भरत मुनि के रचित नाट्यशास्त्र में ‘कुतुप’ का वर्णन है। दक्षिण भारत में इस ‘कुतुप’ के समान ‘मेलम’ संयोजित किए जाते थे। कुतुप तथा मेलम वाद्य वृन्द समूह थे तथा इसमें ढोलक तथा हडक्का (हुडका) अवनद्ध ताल वाद्यों के रूप में प्रयोग किये जाते थे।

सिंधु गंगोला

ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों के तमिल ग्रंथों में ‘मथलम’ नामक अवनद्ध तालवाद्य का वर्णन है जो ढोल के समान था। संगीत जगत में स्थापित एक तथ्य के अनुसार अवनद्ध वाद्य अपने प्रारम्भिक स्वरूप में भोजन पकाने अथवा भण्डारण के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले पात्र रहे होंगे जो मढ़े जाने पर वाद्य यन्त्रों में परिवर्तित हो गए। उत्तराखण्ड के अंचलों में पाए जाने वाले दमुआ-नगाड़े इस धारणा को पुष्ट करते हैं।

अवनद्ध वाद्य का विस्तृत विवरण कत्यूरी शासन काल में रचित ‘ढोल सागर’ में मिलता है। कत्यूरी शासन काल तक वर्तमान गढ़वाल तथा कुमाऊँ मण्डल एक ही इकाई के अधीन थे। यहाँ के सांस्कृतिक लोकजीवन में भी समरूपता रही। कत्यूरी राजा दुलाधामध्येशाह के गुरु रखेणदास द्वारा रचित ‘ढोल-सागर’ उत्तराखण्ड के लोकवाद्यों – ढोल- का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। अल्मोड़ा के समीप लाखुड्यार में पाए गए शैलचित्रों में एक ढोल वादक का अंकन उपलब्ध है।

ढोल-दमुआ को आहत कर विभिन्न तालों का लोक वादकों द्वारा अवतरण किया जाता है। ये दोनों यंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। दमाऊ, जिसे स्थानीय भाषा में दमुआ कहा जाता है, नक्कारे का छोटा रूप है। ढोल और दमाने को क्रमशः पुरुष और स्त्री मानकर इस जोड़े को ‘मिथुन युगल’ माना जाता है जो एक दूसरे के पूरक हैं।

ढोल सागर में ढोल के अवयवों को देवपुत्रों के तुल्य माना गया है। ग्रंथ में प्रदत्त विवरण के अनुसार:

“आपु पुत्रं भवे ढोलं, ब्रह्म पुत्रं न डोरिका।

पौन पुत्र भवे नादम्, भीम पुत्र गजावलम॥

विष्णुपुत्रं भवे पुड़ी, नागपुत्रं कुण्डलिका।

कुरुभ पुत्रं कन्दोरिका, गुणी पुत्र कर्णिका॥”

उक्त आधार पर डेढ़ फीट तक लम्बी डोरिका, नाद, गजावल (बजाने की यष्टि), पुड़ी, कुण्डली तथा कन्दोरी ढोल के अवयव हैं। ढोल की पुड़ी बकरी तथा बारहसिंघे की खाल से मढ़ी जाती है। दमुआ (दमाऊ) ताँबे-पीतल से निर्मित होता है तथा इस वाद्य में बाईं पुड़ी भैंस की खाल की मढ़ी जाती है।

ढोल की पुड़ी के रन्ध्रों के नाम इस प्रकार हैं: 1. सरस्वती, 2. सत्, 3. पाशमतो, 4. दुर्गा, 5. वैष्णवी, 6. जगती, 7. गणेश, 8. गोपी गोपाल आदि।

दमुआ (दमाऊ) ताँबे के एक फुट व्यास तथा पौन फुट गहरे कटोरे नुमा पात्र पर बैल का चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। दमाये को कन्दोरिका की सहायता से गले में टाँग कर दो पतली यष्टिकाओं से बजाया जाता है। ढोलों के पूजन का विधान शास्त्रसम्मत है। वसन्त ऋतु में दमुआ-ढोल का पूजन किया जाता है। शुक्ल पक्ष में हस्त तथा चित्रा नक्षत्र की तिथियों पर विद्वान पुरोहित गाय के गोबर से लिपी भूमि पर तीन मण्डल बनाएंगे। प्रथम मण्डल पर मधु-हलवा (अपूपा) चढ़ाया जाएगा। द्वितीय मण्डल पर पूड़ी तथा पुआ चढ़ाए जाएंगे तथा तृतीय मण्डल में अन्नपिण्ड अर्पित किया जाएगा।

राजा विक्रमादित्य के दरबारी कलावन्त भगवानदास द्वारा प्रतिपादित मध्यमानी शैली की चार उपशैलियाँ – सूतिका, बाकुली, सेन्चुरी तथा झाड़खण्डी बताई गई हैं। इनमें से सूतिका एवं बाकुली उपशैलियों की उत्तराखण्ड के ढोल वादन में दृश्यता है। मध्यमानी शैली की बधाई, घुयेल, धरहरी, जौरास, रहमानी, गोड़, चारतालिम आदि ताल आज भी सुनी जा सकती हैं।

कौशल सक्सेना

बधाई: यह ताल मंगल पर्व तथा उत्सवों के आरम्भ में प्रस्तुत की जाती है। इसकी प्रकृति गंभीर है। यह 20 मात्राओं की ताल है।

घुयेल: यह उग्र देवताओं की उपासना की ताल है जिसका चलन मध्यलय, द्रुत तथा अतिद्रुत लयों में है। मध्यलय में इसे घुयेल कहते हैं जबकि द्रुत में यह चौरास तथा अतिद्रुत में सुल्तानचौक कहलाती है।

सुल्तानचौक: इसकी दो उपचौक – उल्टा तथा सुल्टा चौक कहलाती हैं। जब कलावन्तों की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण उल्टा चौक बजाई जाती है तो उस गाँव के लिये अनिष्ट का खतरा समझा जाता है जिससे बचाव के लिये स्थानीय लोग दादरा के सदृश ताल बजाकर अनिष्ट निवारण करते हैं। सुल्टा चौक 6 मात्रा का है।

ताल प्रस्तुतीकरण में पाँच प्रक्रियाएँ हैं:

1. उठौंण (प्रस्तावना)

2. जक (परिवर्तक बोल)

3. कांस (भाले के सदृश बोल)

4. विसौण (विश्राम)

5. सागल (समाप्ति के बोल)

गोड़: गोड़ वादन में ताल का कलापक्ष मुखरित हो उठता है। ताल की लय विलम्बित होती है। ढोली तथा दमात्री अपनी-अपनी कला दक्षता प्रस्तुत करते हैं।

रहमानी: यह ताल विजय यात्रा के प्रतीक रूप में बजाई जाती है। मार्ग की स्थिति के अनुसार ताल के बोल बदलते रहते हैं। चढ़ाई वाले मार्ग पर ‘उकान’ बजाई जाती है, उतार वाले मार्ग पर ‘उन्दार’ बजती है, नदी तट पर ‘गड़ छल’ बजाया जाता है और समतल मार्ग पर ‘तैच्चार’ बजाई जाती है। वर्तमान में उत्तराखण्ड में बारातों के समय ये तालें बजाई जाती हैं।

चारतालिम: यह रौद्र प्रकृति की अप्रचलित ताल है। ढोल सागर के अनुसार देवाधिदेव शिव ने इसी ताल में ताण्डव नृत्य किया था।

झाड़-खण्डी: तान्त्रिक तालें डंगरियाओं द्वारा जागर जैसे आयोजनों पर बजाई जाती हैं। इसके अन्तर्गत पूसा, हापूसा, नामणी, नाराण आदि तालें आती हैं।

दमुआ-ढोल की इन तालों की संरचना को वंशानुगत परम्परा के आधार पर उत्तराधिकार में सिखाया जाता है। ढोली तथा डंगरी नाम से जाने जाने वाले ये कलाकार ढोल निर्माण तथा वादन की गूढ़ विद्या के वाहक हैं। उत्तराखण्ड के पर्वतीय लोकसंगीत के अनन्य वाद्य दमुआ-ढोल की गूंज ने भारतीय संगीत के ताल पक्ष को सम्पन्न करने में अपना योगदान दिया है।

——————————————————————————————————————–श्री विनोद पंत एवं कौशल सक्सेना का यह लेख मूल रूप से पुरवासी अल्मोड़ा में प्रकाशित हुआ था। जिसे पुरवासी से आभार सहित लेकर पुनः प्रकाशित किया गया है।

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