कुबेर

Kuber


कौशल किशोर सक्सेना

उत्तर दिशा के दिक्पाल कुबेर धन व विलास के देवता कहे गये हैं। वे यक्षों के अधिपति हैं। प्राचीन ग्रंथों में  उन्हें वैश्रवण, निधिपति एवं धनद नामों से भी सम्बोधित किया गया है। वे ब्रहमा के मानस पुत्र पुलस्त ऋषि तनय वैश्रवा के बेटे माने गये हैं। वैश्रवा सुत होने के कारण ही उन्हें वैश्रवण नाम दिया गया है। वराह पुराण में कहा गया है कि उन्हें ब्रहमा ने देवताओं का धनरक्षक नियुक्त किया था। यजुर्वेद में काम के अधिष्ठाता देवता के रूप में सभी अभिलाषायें पूर्ण करने वाले वैश्रवण का उल्लेख आता है। प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि उत्तर दिशा में जीवन के स्वस्थ उपभोग पर विश्वास करने वाली यक्ष संस्कृति भी फेली हुई थी जिसने काव्य और ललित कलाओं का सर्वाधिक प्रसार किया। कालीदास ने कुबेर की राजधानी अलका बताई है जो हिमालय में स्थित है। महाभारत में जिस मणिभद्र यक्ष का जिक्र है, वह बद्रीनाथ के पास माणा में ही निवास करते थे।

भारत में कुबेर पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है। उत्तराखंड में भी जाख और जाखिणी शब्द अत्यंत प्रचलित है। इन्हें ग्राम रक्षक भी माना जाता है।  यहां भी यक्ष पूजा की प्राचीन परम्परा के अनेक प्रमाण मिलते हैं। परन्तु उनका कोई स्वतंत्र मंदिर अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।  कुमाऊँ से यक्षों की अनेक प्रतिमायें प्रकाश में आयी हैं । परन्तु समय की मार से उनमें से अधिकांश दयनीय स्थिति में आ गयी है। इनमें राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा में प्रदर्शित तीसरी शती ई0 की यक्ष प्रतिमा इस क्षेत्र से अब तक प्राप्त यक्ष प्रतिमाओं में सर्वाधिक प्राचीन मानी जा सकती है।

प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथों के अतिरिक्त जैन एवं बौध्द ग्रंथों में भी यक्षों के चित्रण की परम्परा थी। लौकिक देवताओं के रूप में भी वे पूजे जाते थे । कुबेर प्रतिमाओं के निश्चित लक्षण निर्धारित हैं। वराहमिहिर के अनुसार यक्षराज कुबेर को सत्ता के प्रतीक मानव विमान युक्त प्रदर्शित किया जाना चाहिये जो किरीट-मुकुट धारण करें हो तथा विशाल उदर वाले निर्मित होने चाहिये। मत्स्य पुराण में उनको विशाल शरीर, लम्बे उदर, अष्टनिधियों सें युक्त, धवल वस्त्रों से आभूषित, अलंकृत कुंडल, सुन्दर हार एवं बाजुबंध धारण किये, किरीट से अलंकृत, गदाधारी तथा नरयुक्त विमान पर विराजमान दिखाने का उल्लेख है। परन्तु अग्निपुराण में कुबेर को गदा आयुध सहित मेष पर आरूढ़ निर्मित करने का विधान किया गया है। विष्णुधर्मोत्तर जैसे ग्रंथों में उन्हें उदीच्यवेश, कवच, बाईं गोद में पत्नी ऋध्दि को धारण करे हुए चार हाथ एवं रत्नपात्र से अलंकृत बताया गया है।  कुबेर कमल के समान श्वेत, स्वर्ण के समान पीली आभा वाले कहे गये है तथा उनके वस्त्र भी पीले बताये गये हैं। स्वर्ण को सर्वश्रेष्ठ धन माना गया है, इसलिए स्वर्ण के द्योतक उनके पीत वस्त्र हैं। उनके अतीव बली हाथ उनकी अपार शक्ति के प्रतीक हैं। उनके हाथ में सदा रहने वाला गदा दंड नीति का परिचायक है। उनकी पत्नी ऋध्दि देवी जीवन यात्रा की सकारात्मकता की प्रतीक हैं। रत्नपात्र उनके गुणों को प्रदर्शित करता है जबकि नर-विमान पर आरूढ़ होना उनकी राजसत्ता का प्रमाण है । शंख और पद्म निधियों को प्रदर्शित करते है। धान के तोड़े से बनी, नेवले की आकार की थैली जिसे नकुली कहा जाता है उनके हाथ में होती है । धन के देवता के हाथ में यह थैली कुबेर प्रतिमा का आवश्यक अंग है।

हाल ही में इस लेखक ने बैजनाथ में कुबेर की मधुपान करती कुछ अत्यंत सुन्दर प्रतिमायें देखी हैं जिनके कला पक्ष पर विस्तार से चर्चा ही इस लेख का उद्देश है।

मधुपान करती यक्षराज कुबेर की यह प्रतिमा बैजनाथ संग्रहालय की दुर्लभ कलानिधि है। यहां कुबेर को दिक्पाल के रूप में चित्रित न कर धनपति एवं यक्षराज के रूप में चित्रित किया गया है। बैजनाथ संग्रहालय की इस द्विभुजी प्रतिमा में अर्धपर्यक मुद्रा में बैठे, अत्यंत सुगठित शरीर वाले परन्तु महोदर कुबेर की प्रतिमा में सुन्दर देव को स्कन्धों तक विस्तारित पद्म प्रभामंडल से अलंकृत, मुकुट से सज्जित, ग्रेैवेयक, बाजूबंध से अलंकृत कर अभिलिखित पादपीठ पर बैठा दर्शाया गया है । उनके एक कान में रत्नकुंडल तथा दुसरे में वृत्त कुंडल है। छोटा सा मुकुट उनकी अलकों को ढंक रहा है।  वे एक हाथ से मुख के नजदीक सुरा पात्र पकड़े तथा दूसरे हाथ से जंघा के ऊपर नकुल को पकड़े हैं। घुटना धोती से आवृत्त है। मथुरा संग्रहालय में भी उनकी कुछ अत्यंत प्राचीन प्रतिमायें इसी प्रकार चषक तथा नकुल को धारण किये प्रदर्शित रही हैं। उनके पार्श्व में खडी परिचारिका अथवा उनकी पत्नी ऋध्दि हैं जिनके  हाथ में भी घट सदृश सुरापात्र है। चेहरे पर मंद मुस्कान सहित भारी भरकम शरीर वाले कुबेर अर्धउन्मीलित आंखों से निहार रहे हैं। बैजनाथ की इस प्रतिमा में सुरा को उढेलते हुए प्रदर्शित नहीं किया गया है। परन्तु मुखमुद्रा से ऐसा अवश्य प्रतीत होता है कि वे सुरापान का आनंद  ले रहे हैं। महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मांस तथा सुरा यक्षों का प्रिय भोजन कहा गया है । कालीदास ने मेघदूत में भी यक्षों द्वारा रमणियों के साथ कल्पवृक्ष से उत्पादित सुरा पीने का उल्लेख किया है। इसलिए उत्तराखंड में भी मधुपायी कुबेर की उपस्थिति अस्वाभाविक नहीं है। यह प्रतिमा वाहन विहीन है। पादपीठ पर अंकित लेख  उसे 9वीं शती का प्रमाणित करता है। कदाचित कुबेर की इस क्षेत्र में यह प्रथम अभिलिखित प्रतिमा है जो शैली की दृष्टि से दुर्लभ मानी जा सकती है

बैजनाथ से ही प्राप्त एक अन्य प्रतिमा में विशाल शरीर वाले लम्बकर्ण देव मुकुट, कुंडल, बाजूबंध, गले में कंठा पहने हुए ग्रैवेयक एवं पाद आभूषणों सहित दर्शाये गये है। दीर्घ नाभि, विशाल उदर वाले देव की चरण चौकी पर निधिपात्र अंकित है। उनके एक हाथ में सुरापात्र तथा दूसरे हाथ में नकुल है। सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह प्रतिमा अपने आप में अनूठी है।

बैजनाथ मंदिर के पास के ही एक गधेरे से भी कुबेर की कुछ अन्य अर्धनिर्मित प्रतिमायें भी मिली हैं। जिससे पता चलता है कि सम्भवत: यहां प्रतिमायें गढ़ने की कोई इकाई ही रही होगी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है इस क्षेत्र में पायी गयी कुबेर की इन प्रतिमाओं ने इस क्षेत्र की शिल्पनिधि की श्रीवृध्दि का और अधिक विस्तार किया है।

    Posted by Kaushal Kishore Saxena on Feb 19th 2012 | Filed in Articles | Comments (0)

    Himvan.com

    Indigenous art and craft constitute integral part of Kumaon culture. These portray the genius of the people and places. Spanning over centuries an amazing and awe inspiring mosaic of cultural artifacts have evolved presenting a magnificent landscape for cultural tourism. Obviously, the spread effect of Kumaon genius has assumed global proportion and made it a prime destination for the tourist to compulsively spare time to go in search of things of joy and man made beauty. Himvan.com has brought them all here for you.


    Take a look...








    Comments :





    सुशील कुमार जोशी : कैलाश के उज्जवल भविष्य के लिये शुभकामनाएं और हिमवान की टीम को साधुवाद

    Mmjoshi19 : Very good effort for the information of our Cultural heritage.
    Congrats Saxena ji.

    S.K. Joshi : बहुत से अन्छुवे पहलुवों को समेट कर जो इंद्रधनुषी गुलदस्ता आप बना रहे हैं वाकई काबिले तारीफ है।
    साधुवाद!

    S. K. Joshi : माना कि हाशिये बहुत हैं
    प्रतिभा को नकारने के लिये
    फूलों को फेंकते चले जाइये
    खुश्बू को कैसे रोकेंगे फैलने से?


    Aradhana : Beautiful expressions of the magnificent Himalayas… So live and real..


    Rakesh Rayal : जोशी जी की ‘कला’ में साहित्‍य की झलक नजर आती है। साहित्‍य का जुडाव भावनाओं से होता है और भावनाओं का जुडाव दिल से। इनके अन्‍दर वही बात है जिसे जानकार कहते हैं ”जैसी दृष्टि वैसी श्रृष्टि”। किसी भी वस्‍तु या सौन्‍दर्यता को देखने के लिए आंखे और समझने के लिए सोच होनी चाहिए। जोशी जी इन सब बातों के धनी हैं।

    अल्मो़डा के नौले-धारों का अस्तित्व खतरे में


    More Photos

    कौशल किशोर सक्सेना

    अल्मो़डा । अपने प्राकृतिक जल स्त्रोतों के लिए प्रसिद्ध रहे अल्मो़डा नगर के नौले- धारे समाप्त होने की कगार पर है। नौलों-धारों के लिये विख्यात अल्मो़डा के अधिकांश जल स्त्रोत पिछले एक सौ वर्षो में सूख चुके हैं । हाल ही में हुए सर्वेक्षण से मालूम हुआ है कि अल्मो़डा नगर में वर्तमान में उपलब्ध लगभग 60 से अधिक नौलों का अस्तित्व संकट में है। प्रदूषण की मार झेल रहे इनमें से अधिकांश के जल स्तर में भीषण गिरावट आई है। पूरे नगर में केवल चार नौले ही पीने के पानी के लिए पूर्णरूप से सुरक्षित हैं। शेष नौलों के जल में इतना अधिक प्रदूषण हो चुका है कि उनका जल पीने के लिए ही नहीं सिंचाई के लिए भी खतरनाक है।

    इतिहास बताता है कि अल्मो़डा की बसासत प्रारम्भ होने के समय से ही यहां अनेक पेयजल स्त्रोत विद्यमान थे। पंडित बद्रीदत्त पांडे ने कुमाऊं के इतिहास में इस नगर में 360 नौलों व धारों का उल्लेख किया है। अल्मो़डा के बसने के प्रारम्भिक दिनों में जल स्त्रोंतो की प्रचुरता के कारण नैल के पोखर के पास ही राजा बालोकल्याण चंद द्वारा अपना निजी महल बनवाया गया था। चंद वंश के प्रतापी शासक राजा बाजबहादुर चंद ने अपने चालीस वर्ष के कार्यकाल में अल्मो़डा में पेयजल के लिए अनेक नौलों का निर्माण करवाया। राजा उदयोतचंद ने भी डयो़ढी पोखर का निर्माण करवाया था। प्रफुल्ल पंत, जिन्होंने बीते वर्षों में नगर की पेयजल समस्या एवं प्राकृतिक जल स्त्रोतों पर विस्तृत शोध किया है, ने उल्लेख किया है कि चंद शासकों के निवास मल्ला महल के पास भी कई जल स्त्रोत मौजूद थे। अल्मो़डा में पेयजल स्त्रोतों की विधिवत गणना वैकेट के बन्दोबस्त में सन् 1862 में की गई। हांलांकि उस समय नगर पालिका की सीमा बहुत छोटी थी लेकिन तब भी 36 प्राकृतिक जल स्त्रोत यहां अच्छी हालत में मौजूद थे। इस सैटेलमेंट में अल्मो़डा सीमा में दो कुऐं भी दर्शाये गये थे। वर्ष 1944 में किये गये बन्दोबस्त में भी अल्मो़डा नगर में 48 जल स्त्रोत बताये गये थे।

    लेकिन आबादी के विस्तार तथा पाइप लाइनों से नगर में पानी लाने के साथ ही नौलों के रखरखाव और इनके प्रति चेतना में कमी आती गई। वर्ष 1990 में किये गये सर्वेक्षणों में बताया गया है कि नगर पालिका एवं इससे लगे हुए क्षेत्रों में नौलों की संख्या 99 थी लेकिन इनमें से केवल 68 ही किसी प्रकार जीवित थे शेष 31 सूख चुके थे। वर्ष 2006 तक अल्मो़डा नगर पालिका सीमा के अन्दर 73 नौलेों का अस्तित्व था।

    अब हालत यह है कि नगर में तीन-चार नौलों धारों को छो़डकर अधिकांश का पानी न तो पेयजल के लिए उपयुक्त है न ही सिंचाई के लिए। आशंका है कि अधिकांश नौलों का पानी सीबर लाइनों एवं भवनों में बने सैप्टिक टैंकों में हो रहे रिसाव के कारण प्रदूषित हो चुका है। कई नौलों का सफाया तो अतिक्रमण के कारण हो गया तो कुछ नौलों के उपर लोगों ने मकान ही बना दियं। नगर की कुछ संस्थाओं ने स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए नौलों के रखरखाव के लिए अभियान भी चलाया। इनमे शैक्षिक चेतना समिति एवं प्रभात साह गंगोला एवं उनके साथियों द्वारा नौलों के रख रखाव तथा संवारने के लिए नगर के कुछ नौलों के जीर्णोद्धार का अभियान चलाया गया। लेकिन शेष नौलों की स्थिति में आज भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। आज भी केवल सिद्ध का नौला, रानीधारा, लक्ष्मेश्वर जैसे कुछ ही जल स्त्रोत ऐसे रह गये है जिनका पानी पीने योय है। खेद का विषय यह है कि इन नौलों धारों का बचाने के लिए अभी भी कोई जन चेतना नहीं उपजी है। यदि यही स्थिति रही तो हो सकता है कि आने वाले कुछ वर्षो में नगर के  जल संकट के निवारण में रामबाण बने इन जल स्त्रोंतो का अस्तित्व ही हमेशा के लिए समाप्त हो जाये।

      Posted by Kaushal Kishore Saxena on Nov 24th 2011 | Filed in Articles | Comments (3)

      « Prev - Next »

      All Rights Reserved.www.himvan.com