भारत की दुर्लभ कला निधि है पोण राजा की प्रतिमा

- कौशल किशोर सक्सेना

 


अल्मोड़ा। यदि आपको उत्तर भारत की बेहतरीन प्राचीन धातु प्रतिमाओं की कला और सौन्दर्य को सचमुच निहारना है तो जागेश्वर जाकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संग्रहालय में विराजमान पोण राजा की प्रतिमा को जरूर देखें ।

लम्बे वनवास के बाद पोण राजा अपने घर जागेश्वर वापस लौट आये हैं। पोण राजा की मूर्ति को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जागेश्वर संग्रहालय में जनसामान्य के अवलोकन के लिए प्रदर्शित कर दिया गया है। इसे  देखने भारी मात्रा में श्रद्धालु और पर्यटक जागेश्वर का रूख कर रहे हैं।

पोण राजा की  अष्टधातु निर्मित यह प्रतिमा मूल रूप से जागेश्वर के समीप डंडेश्वर मंदिर में स्थापित थी जहां से सुरक्षा की दृष्टि से इसे जागेश्वर मुख्य मंदिर के पा्रंगण में स्थित नवदुर्गा मंदिर में रख दिया गया था परन्तु तस्करों द्वारा प्रतिमा मंदिर से चुरा ली गयी । कला एवं शैली के आधार पर माना जाता है कि नवीं शती ई0 में निर्मित पोण की यह प्रतिमा विश्व की धातु कला की श्रेष्ठतम प्रतिमाओं में से एक है तथा सौन्दर्य एवं निर्माण तकनीक की दृष्टि से देश की दुर्लभ कला निधि है। इसकी तुलना चिदम्बरम की प्रसिद्ध नटराज प्रतिमा से की जाती है।

यह मूर्ति 1974 के अक्टूबर माह में जागेश्वर मंदिर परिसर में बने नवदुर्गा मंदिर से चुराई गयी थी तथा तस्करों द्वारा इसे विदेश भेजने की पूरी तैयारी की गयी थी। लेकिन इस चेारी के विरूद्ध स्थानीय छात्रों के नेतृत्व में विशाल जनआन्दोलन प्रारम्भ हो जाने पर जन दबाब के चलते मुम्बई के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से प्रतिमा को सीबीआई द्वारा बरामद कर लिया गया। कानूनी पचड़ों में फंसे पोण राजा वर्षा तक सीबीआई के गोदाम में पड़े रहे । न्यायालय के आदेश के बाद 17 अक्टूबर 1989 को इसे सीबीआई ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को सांप दिया। परन्तु तस्करों द्वारा यह प्रतिमा काफी क्षतिग्रस्त कर दी गयी ।  प्रतिमा का एक हाथ तथा पैर के अलावा पैर की अंगुली को काट दिया गया था। इसलिए भा0पु0स0 ने इसे अपनी प्रयोगशाला में उपचारित कर नवम्बर 2000 मे अन्तिम रूप से इसे जागेश्वर वापस भेज दिया। इस बीच पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा उत्तराखंड के लिए पृथक से मंडल इकाई का गठन कर दिये जाने तथा जागेश्वर में संग्रहालय का निर्माण हो जाने पर अत्यधिक महत्व की इस प्रतिमा को समुचित सुरक्षा में प्रदर्शित करने का निर्णय लिया गया। । लगभग एक कुंतल वजन की प्रतिमा की लम्बाई 4 फुट 8 इंच है। प्रतिमा की मुद्रा से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे मूल रूप में पेाण राजा अपने हाथों में दीपक पकड़े हुए होंगे। परन्तु दीपक अब हाथ में नहीं है। राजसी मुकुट, गले में कंठा, हाथों में बाजुबंध एवं कंगन तथा पैरों में कड़े पहने हैं। धोती धारण किये पोण की यह दिपदिप करती प्रतिमा अत्यंत भव्य है।        विद्वानों का मानना है कि जागेश्वर संग्रहालय में प्रदर्शित यह प्रतिमा कत्यूरियों के पूर्वज महाप्रतापी नरेश शालिवाहन की है जिसने पोण की पदवीं धारण की थी। इन्हे कत्यूरी राजवंश का आदि पुरूष भी माना जा सकता है। कत्यूरी राजवंश ने इस क्षेत्र में सातवीं से लेकर दसवीं शती के अन्त तक शासन किया है। मान्यता है कि पोण राजा शालिवाहन ने उत्तर भारत के सशक्त कुषाण राजवंश को पराजित करने में अभूतपूर्व पराक्रम दिखाया था। इतिहासविद् डा0 एम पी जोशी ने उल्लेख किया है कि कत्यूरी नरेश जब-जब संकट से घिर जाते थे तब-तब विपत्ति दूर करने के लिए अपने पूर्वज पोण का आव्हान किया करते थे। ऐसे ही अनुष्ठानों के तहत पोण की अन्य प्रतिमायें भी मंदिरों में स्थापित की गयी थीं। सम्भवतः इसी लिए पोण की ये प्रतिमायें केवल कत्यूरी मंदिरों कटारमल तथा जागेश्वर में ही मिली हैं। डा0 जोशी का यह भी मत है कि नवीं एंव सोलहवीं शती में संकट में घिरे कत्यूरी राजवंश द्वारा किसी मनौती या संकट को दूर करने की कामना से पोण राजा का आहवान किया गया होगा जिसके लिए कटारमल सूर्य मंदिर तथा जागेश्वर में पोण राजा की मूर्तियां स्थापित की गयी होंगी। जागेश्वर में आज भी हाथ में दीपक लेकर संतान प्राप्ति की कामना की पूर्ती हेतु मनौती मांगने की परम्परा है। माना जा सकता है कि कत्यूरी नरेशों द्वारा पोण की यह प्रतिमा अपने वंश को सुरक्षित रखने अथवा किसी अन्य मनोकामना की पूर्ती के लिए स्थापित की गयी होगीं। इस क्षेत्र में कटारमल सूर्य मंदिर में अष्टघातु तथा जागेश्वर के जागनाथ मंदिर में पोण राजा की चंदी से बनी ऐसी दो धातु प्रतिमाएं और भी थीं जो 1960 के दशक में चोरी चली गयीं। परन्तु ये दोनों आज तक वापस नहीं आ सकी हैं।

               पोण की प्रतिमा को जागेश्वर संग्रहालय में अब  सशस्त्र गारद के साथ बुलेट प्रूफ सुरक्षा में आम जनता के दर्शन हेतु प्रदर्शित कर दिया गया है।  पोण राजा के जागेश्वर वापस आने से पर्यटकों की संख्या में इजाफा तो हुआ ही है साथ ही साथ जागेश्वर तीर्थ तथा उसके संग्रहालय का महत्व और भी बढ़ गया है।

    Posted by Kaushal Kishore Saxena on Mar 23rd 2012 | Filed in Articles | Comments (0)

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    Comments :





    सुशील कुमार जोशी : कैलाश के उज्जवल भविष्य के लिये शुभकामनाएं और हिमवान की टीम को साधुवाद

    Mmjoshi19 : Very good effort for the information of our Cultural heritage.
    Congrats Saxena ji.

    S.K. Joshi : बहुत से अन्छुवे पहलुवों को समेट कर जो इंद्रधनुषी गुलदस्ता आप बना रहे हैं वाकई काबिले तारीफ है।
    साधुवाद!

    S. K. Joshi : माना कि हाशिये बहुत हैं
    प्रतिभा को नकारने के लिये
    फूलों को फेंकते चले जाइये
    खुश्बू को कैसे रोकेंगे फैलने से?


    Aradhana : Beautiful expressions of the magnificent Himalayas… So live and real..


    Rakesh Rayal : जोशी जी की ‘कला’ में साहित्‍य की झलक नजर आती है। साहित्‍य का जुडाव भावनाओं से होता है और भावनाओं का जुडाव दिल से। इनके अन्‍दर वही बात है जिसे जानकार कहते हैं ”जैसी दृष्टि वैसी श्रृष्टि”। किसी भी वस्‍तु या सौन्‍दर्यता को देखने के लिए आंखे और समझने के लिए सोच होनी चाहिए। जोशी जी इन सब बातों के धनी हैं।

    आज भी जिन्दा है ब्रिटिश कालीन मत्स्य आखेट की परम्परा

    -बृजेश तिवारी



    प्राकृतिक सौन्दर्य का धनी उतराखंड राज्य अपने रीति रिवाजों और सामाजिक सरोकारों के लिये प्रसिद्ध है। आज भी प्रदेश में अनेंकों ऐसे रीति रिवाज व परम्परायें जीवित हैं जो उत्तराखंड के अलावा कही और देखने को नही मिलती। ऐसी ही एक अनोखी परम्परा आज भी रामगंगा नदी पर देखी जा सकती है । यह अनोखी परम्परा सामूहिक मत्स्य आखेट से जुड़ी है। इसमें निधार्रित समय व निर्धारित दूरी पर हजारों ग्रामीण एक साथ मछलियों का शिकार करते हैं।
    गढ़वाल के खीड़ाखंसर नामक स्थान से निकलने वाली रामगंगा नदी में ब्रिटिश काल से ही डह नाम से मछलियों के आखेट की परम्परा चली आ रही है। कहा जाता है कि ब्रिटिश समय के दौरान जब एक अंग्रेज अधिकारी भिकियासैंण से सल्ट की ओर जा रहा था तो उस समय रामगंगा नदी पार करते समय उसके खच्चर से उसके आवश्यक दस्तावेजों वाला एक सन्दूक रामगंगा नदी में जा गिरा। काफी मशक्कत के बाद भी अंग्रेज अधिकारी उसे नही निकाल पाये। बाद में जीना उपजाति के एक व्यक्ति ने उस सन्दूक को नदी से बाहर निकाला। अंग्रेज अधिकारी जब उस व्यक्ति से ईनाम मांगने की बात कही तो उसने रामगंगा नदी में मछलियों के आखेट की आज्ञा मांगी। अंग्रेज अधिकारी ने उस युवक की बहादुरी से खुश होकर जून माह में रामंगगा नदी में आखेट करने की आज्ञा दे दी। इसके लिये उस अंग्रेज अधिकारी ने उस व्यक्ति को सनद लिखकर इसकी अनुमति दी। चूंकि उस समय मछलियों के आखेट पर प्र्रतिबंद्ध था इसलिये उन ग्रामीणों के लिये यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। अंग्रेज अधिकारी की अनुमति के बाद क्षेत्र के दूरदराज के गांवों के लोेग जीना लोंगों के नेतृत्व में यहां मछलियों का आखेट करने लगे। प्रतिदिन आखेट शुरू होने से पहले डह की दूरी व समय निर्धारित किया जाता था। नदी में पानी के तेज बहाव से बचने के लिये आखेटक कमर में आलिया सूखे तुमडे बांधकर नदी में उतरते थे। ताकि पानी के तेज बहाव में आखेटक बह ना सकें। खीडाखंसर से मरचूला तक यह मेला जून के ही महीने में चलता था। और बारिश होते ही इस मेले के समापन की घोषणा कर दी जाती थी। आखेट के दौरान यदि किसी की की मत्यु हो जाती थी तो उसकी रिर्पोट पटवारी के पास न होकर जीना लोंगों की उपस्थिति वाली पंचमंडली में होती थी। यह पंचमंडली ही मृतक का पंचनामा भरती थी। खीडाखंसर से चैखुटिया, भिकियासैंण, सल्ट, मरचूला व कार्बेट पार्क के जंगलों से होकर कालागढ़ डैम में मिलने वाली रामगंगा नदी पर लगने वाला यह मेला अपनी तरह का अलग मेला है। बाद में रामगंगा नदी की लम्बाई को देखते हुये हिनौला से मरचूला तक के क्षेत्र का लाईसेंस तल्ला सल्ट के तया गांव के डढरिये उपजाति के लोंगों को भी दे दिया गया। यहां भी यह मेला पुराने नियमों के आधार पर ही संचालित किया जाता था। लेकिन लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व इसी मेले के दौरान रंजिशन एक व्यक्ति की मत्यु के बाद जीना और डढरिया उपजाति के लोंगों ने विधिवत इस मेले के संचालन से अपना हाथ खीच लिया। हांलाकि इस घटना के बाद अब मेले के स्वरूप में भी बदलाव आ गया है। लेकिन आज भी स्थानीय निवासी अपनी अपनी जिम्मेदारी पर इस मेले का आयोजन करते हैं। जून माह में हजारों की संख्या में मत्स्य आखेटकों के यहां पहुंचने से रामगंगा नदी पर मेले जैसा माहौल होता है। डह नाम से प्रसिद्ध इस मेले के दौरान ग्रामीण मछली बेचकर अच्छी आमदनी तो करते ही हैं साथ में गर्मियों के मौसम में घटों जल क्रीडा का लुत्फ उठाने का भी ये एक अच्छा साधन है। हजारों लोंगों की संख्या वाले इस मेले से जहां सामाजिक सौहार्द बरकरार है। वही दूरदराज से लोग इस मेले को देखने भी यहां पहुंचते हैं। सम्भवतः मछलियों का इस तरह से आखेट करना पूरे प्रदेश में अकेले सिर्फ इस क्षेत्र की परम्परा है। बाहरी क्षेत्रों से आने वाले लोग ग्रामीणों के मेले का जमकर लुत्फ लेते हैं। और मछलियों के शौकीन लोग तो यहां जमकर सस्ते दामों में मछलियां भी खरीदते हैं।

      Posted by Kaushal Kishore Saxena on Mar 5th 2012 | Filed in Articles | Comments (2)

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